एसबीआई के लाखों ग्राहक अनजाने में हर महीने छोटे-छोटे जुर्माने का शिकार हो रहे हैं। न्यूनतम औसत मासिक शेष राशि न बनाए रखने पर लगने वाले चार्जेस की वजह से सालाना सैकड़ों रुपये का नुकसान हो सकता है। यह नियम शाखा के स्थान पर निर्भर करता है और इसे समझना हर खाताधारक के लिए जरूरी हो गया है।

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न्यूनतम बैलेंस क्या है और क्यों जरूरी?
न्यूनतम बैलेंस यानी पूरे महीने के अंतिम शेषराशि का औसत। मेट्रो और बड़े शहरों की शाखाओं में तीन हजार रुपये, अर्ध-शहरी इलाकों में दो हजार और ग्रामीण क्षेत्रों में एक हजार रुपये का औसत बनाए रखना पड़ता है। अगर यह लक्ष्य पूरा न हो, तो बैंक अगले महीने चार्ज काट लेता है। यह व्यवस्था बैंक की स्थिरता के लिए है, लेकिन आम आदमी के लिए चुनौती बन जाती है। खासकर पंजाब जैसे राज्यों में जहां ग्रामीण और शहरी खाते दोनों चलते हैं।
चार्जेस का पूरा हिसाब
कमी कितनी हुई, उसके आधार पर चार्ज अलग-अलग लगते हैं। अगर औसत शेष पचास प्रतिशत या उससे कम रह गया, तो मेट्रो में दस रुपये, अर्ध-शहरी में साढ़े सात और ग्रामीण में पांच रुपये कट सकते हैं। पचास से सत्तर पांच प्रतिशत कमी पर मेट्रो में बारह, अर्ध-शहरी में दस और ग्रामीण में साढ़े सात रुपये। सबसे ज्यादा सत्तर पांच प्रतिशत से ऊपर की कमी होने पर मेट्रो में पंद्रह, अर्ध-शहरी में बारह और ग्रामीण में दस रुपये। ये रकम जीएसटी के साथ और बढ़ जाती है। साल भर में बार-बार ऐसा होने पर एक सौ अस्सी रुपये तक का बोझ पड़ सकता है।
2026 में क्या बदला?
इस साल सोशल मीडिया पर कई अफवाहें फैलीं कि न्यूनतम बैलेंस दस हजार रुपये हो गया या जुर्माना कई गुना बढ़ गया। हकीकत में पुराने नियम ही चल रहे हैं। कुछ खास खाते जैसे बेसिक सेविंग्स या सैलरी अकाउंट में जीरो बैलेंस की सुविधा बनी हुई है। बैंक ने पारदर्शिता बढ़ाई है, लेकिन नियमित खातों पर सख्ती कायम है। आरबीआई के दिशानिर्देशों के तहत ग्राहकों को सूचना दी जाती है, फिर भी जागरूकता की कमी से नुकसान हो रहा है।
ग्रामीण और शहरी ग्राहकों पर असर
अमृतसर जैसे अर्ध-शहरी क्षेत्रों में दो हजार रुपये का औसत बनाना आसान लगता है, लेकिन छोटे व्यापारी या किसानों के लिए फ्लक्चुएटिंग बैलेंस मुश्किल पैदा करता है। महानगरों में तीन हजार रुपये की बाधा ज्यादा कठिन है। महिलाएं, सीनियर सिटीजन्स और कम आय वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। डिजिटल बैंकिंग के जमाने में जीरो बैलेंस खातों को प्राथमिकता देना चाहिए।
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बचाव के आसान उपाय
सबसे पहले अपने खाते का प्रकार जांचें और YONO ऐप से मासिक औसत देखें। अगर बैलेंस अक्सर कम रहता है, तो जीरो बैलेंस वाले खाते में शिफ्ट हो जाएं। नियमित जमा रखें ताकि औसत बना रहे। गलत कटौती पर शाखा में शिकायत करें। शाखा बदलने पर नए नियम पूछ लें। थोड़ी सावधानी से हर महीने का नुकसान रोका जा सकता है।
आगे की राह
बैंकिंग सिस्टम डिजिटल हो रहा है, लेकिन बेसिक नियमों पर अमल जरूरी है। ग्राहक जागरूक हों तो यह बोझ कम हो सकता है। सरकार और बैंक मिलकर जीरो बैलेंस को बढ़ावा दें, ताकि हर नागरिक बिना टेंशन के खाता चला सके। समय रहते अलर्ट हो जाएं, वरना छोटी रकम सालाना बड़ा नुकसान बन जाएगी।
















