मिडिल ईस्ट में छिड़ी ईरान-इजरायल के युद्ध ने दुनिया के तेल बाजार के लिए परेशनिया खड़ी कर ली है। ब्रेंट क्रूड के दाम 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुके हैं, यह 2020 के बाद का सबसे तेज उछाल है। होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाला 30 प्रतिशत से ज्यादा ग्लोबल ऑयल सप्लाई खतरे में है। भारत जैसे देश, जो ज्यादातर तेल बाहर से लाते हैं, इसकी चोट सीधे हमारी जेब पर पड़ रही है। क्या अब पेट्रोल पंप पर लंबी कतारें और जेब पर भारी बोझ नजर आएगा?
युद्ध दसवें दिन में पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों ने तनाव को चरम पर ले जाकर अमेरिका को भी इसमें खींच लिया है। नतीजतन, तेल उत्पादन प्रभावित हो रहा है और जियोपॉलिटिकल जोखिमों के कारण कीमतों में रिस्क प्रीमियम जुड़ गया है। भारत जैसे देश, जो अपनी 85 से 90 प्रतिशत तेल जरूरत आयात से पूरी करता है, इसकी मार सबसे ज्यादा झेलेगा।

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ईंधन दामों पर सीधा खतरा
देश में पेट्रोल और डीजल के दाम कई हालतों पर टिके हैं। इनमें कच्चे तेल की वैश्विक कीमत, डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर, रिफाइनरी की लागत, वितरक कमीशन और केंद्र-राज्य टैक्स शामिल हैं। अभी के समय में डॉलर 90 रुपये के आसपास है। अगर तेल 100 डॉलर पर टिका रहा, तो दिल्ली जैसे शहरों में पेट्रोल में 12 से 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल में बराबर की तेजी देखि जा सकती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह यह महंगाई को 7 प्रतिशत से ऊपर धकेल सकता है। परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उपभोक्ता सामान क्षेत्रों की लागत बढ़ेगी, जो आम आदमी के बजट पर भारी पड़ेगी। तेल कंपनियां गतिशील मूल्य निर्धारण का पालन करती हैं, लेकिन अगर यह अस्थिरता ज्यादा दिनों तक खिंची तो परेशानियां और सीरियस हो जाएंगी।
भारत की ताकत और कमजोरी
सरकार के पास 50 दिनों का रिजर्व स्टॉक मौजूद है, जो तत्काल मूल्यवृद्धि को कंट्रोल में रख सकता है। सरकार रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार खोलकर या नए आयात स्रोत तलाशकर राहत दे सकती है, लेकिन अगर जंग लंबी खिंची तो ये कदम भी अपर्याप्त साबित हो सकते हैं।
तेल के दामों में अंतर् देखें
| स्थिति | कच्चा तेल प्रति बैरल | पेट्रोल वृद्धि प्रति लीटर | रिजर्व स्थिति |
|---|---|---|---|
| सामान्य | 70-75 डॉलर | न्यूनतम | 50 दिन |
| युद्धकालीन | 106-118 डॉलर | 12-14 रुपये | पर्याप्त लेकिन अस्थायी |
आगे की राह क्या?
विश्लेषकों का मानना है कि डिप्लोमेसी या बाहरी दबाव से कीमतें 80-100 डॉलर पर स्थायी हो सकती हैं। वरना 120 डॉलर तक जाने का डर है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि खुदरा दामों पर तुरंत असर नहीं पड़ेगा। निवेशक तेल कंपनियों के शेयरों पर नजर रखें, जिससे वे लाभ लेना चाहते हैं।
यह घटना भारत की ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती दे रही है। नवीकरणीय स्रोतों पर जोर और घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी हो गया है। आम नागरिकों को ईंधन बचत और सार्वजनिक वाहनों का अधिक उपयोग करना चाहिए। आने वाले दिनों में चलेगा कि यह परेशानी कितनी बढ़ती है।
















