स्मार्टफोन यूजर्स को झटका लगने वाला है। केंद्र सरकार मोबाइल इंटरनेट डेटा पर हर जीबी के हिसाब से अलग टैक्स लगाने की योजना बना रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली बैठक में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा हुई। अधिकारियों को इसकी पूरी संभावना जांचने और रिपोर्ट देने का समय दिया गया है।

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योजना का मकसद क्या है?
सरकार का कहना है कि यह कदम लोगों के अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल को नियंत्रित करेगा। साथ ही सही दिशा में इंटरनेट उपयोग बढ़ाने और सरकारी खजाने को मजबूत करने पर जोर है। पिछले साल देश में डेटा की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची थी। अगर प्रति जीबी मामूली राशि भी वसूली जाए तो अरबों रुपये का फायदा हो सकता है।
उपभोक्ताओं पर असर
साधारण रिचार्ज प्लान महंगे हो जाएंगे। मिसाल के तौर पर एक सामान्य मासिक पैक पर दर्जन भर रुपये अतिरिक्त देना पड़ सकता है। अभी भी रिचार्ज पर जीएसटी का बोझ है। ऐसे में दोहरी मार से आम आदमी की जेब ढीली पड़ जाएगी। खासकर युवा और ग्रामीण इलाकों में जहां सस्ता डेटा जीवन का हिस्सा बन चुका है वहां परेशानी बढ़ेगी।
विशेषज्ञ चिंतित
जानकारों का मानना है कि डेटा की निगरानी करना मुश्किल काम है। इससे इंटरनेट की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। कुछ देशों में ऐसी कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि उपभोक्ताओं ने विरोध किया। टेलीकॉम कंपनियां मौजूदा करों में कमी की मांग कर रही हैं ताकि बोझ संतुलित रहे।
उद्योग को झटका
देश में सवा अरब से अधिक मोबाइल कनेक्शन हैं। सस्ते डेटा ने ऑनलाइन पढ़ाई, व्यापार और मनोरंजन को नई उड़ान दी। नया टैक्स आने पर प्लान की कीमतें चढ़ेंगी। इससे नई तकनीक जैसे फाइव जी का प्रसार धीमा पड़ सकता है। कंपनियों को ग्राहक खोने का डर सता रहा है।
आगे की राह
अभी यह सिर्फ विचार चरण में है। अंतिम फैसला रिपोर्ट के बाद होगा। उपभोक्ता समूह सक्रिय हो गए हैं। वे नियामक संस्था से दखल की अपील कर रहे हैं। सितंबर तक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। तब तक सतर्क रहें और खबरों पर नजर रखें।
















