
पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच, भारत और ईरान के आर्थिक संबंधों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत पर अभी भी ईरान का कोई कर्ज बकाया है? सरकारी आंकड़ों और हालिया बजट रिपोर्टों के आधार पर स्थिति अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।
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तेल का ‘अरबों डॉलर’ का बकाया: अब क्या है स्थिति?
एक समय था जब भारत पर ईरान का कच्चे तेल का लगभग $6.5 बिलियन (करीब ₹43,000 करोड़) बकाया था, यह वह दौर था जब परमाणु प्रतिबंधों के कारण बैंकिंग चैनल बंद थे।
- कर्ज की अदायगी: 2016 में प्रतिबंध हटने के बाद, भारत ने किश्तों में इस राशि का बड़ा हिस्सा यूरो (Euro) और रुपये में चुका दिया था।
- वर्तमान स्टेटस: 2019 में अमेरिका द्वारा दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने ईरान से तेल का आयात लगभग बंद कर दिया है जानकारों के अनुसार, अब कोई नया “विशाल कर्ज” शेष नहीं है।
चाबहार बंदरगाह: भारत ने चुकाई अपनी पूरी प्रतिबद्धता
रणनीतिक रुप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) को लेकर भारत ने अपनी वित्तीय जिम्मेदारी पूरी कर दी है।
- $120 मिलियन का निवेश: भारत सरकार ने संसद में सूचित किया है कि चाबहार के शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के विकास के लिए घोषित $120 मिलियन की पूरी राशि का भुगतान किया जा चुका है। इसकी अंतिम किश्त अगस्त 2025 में हस्तांतरित की गई थी।
- बजट 2026 का संकेत: फरवरी 2026 में पेश किए गए बजट में चाबहार के लिए नए फंड का आवंटन ‘शून्य’ रखा गया है, क्योंकि प्राथमिक निवेश पूरा हो चुका है और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण फिलहाल नया बड़ा निवेश नहीं किया जा रहा है।
रुपया भुगतान तंत्र (Rupee Payment Mechanism)
भारत और ईरान के बीच व्यापार अब भी ‘रुपया भुगतान तंत्र’ के जरिए हो रहा है इसके तहत:
- भारत अपने आयात का भुगतान भारतीय रुपयों में यूको बैंक (UCO Bank) के एस्क्रो खातों में जमा करता है।
- ईरान इस पैसे का उपयोग भारत से बासमती चावल, चाय, दवाएं और चीनी खरीदने के लिए करता है यह एक ‘कैशलेस’ द्विपक्षीय व्यापार जैसा है, जिससे नया कर्ज बनने की संभावना खत्म हो जाती है।
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मार्च 2026 की ताजा चुनौतियां
ईरान और इजरायल के बीच जारी मार्च 2026 के सैन्य तनाव ने भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, हालांकि भारत का कोई वित्तीय बकाया नहीं है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण भारत के तेल टैंकरों और कार्गो शिपिंग की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।
तकनीकी रुप से भारत अब ईरान का कर्जदार नहीं है, भारत ने अपने पुराने तेल बिलों और चाबहार निवेश के वादों को पूरा कर दिया है अब मुख्य ध्यान कर्ज चुकाने पर नहीं, बल्कि युद्ध जैसी स्थिति में अपने व्यापारिक मार्गों को बचाने पर है।
















