
भारत में वैश्विक तनाव (विशेष रूप से पश्चिम एशिया संकट) के कारण रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति में आ रही बाधाओं और किल्लत को देखते हुए, वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी ‘देसी विकल्प’ डाइमिथाइल ईथर (Dimethyl Ether – DME) पर काम तेज कर दिया है, यह तकनीक न केवल LPG पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि आम आदमी की रसोई के बजट को भी राहत दे सकती है।
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LPG की किल्लत होगी खत्म! भारत का ‘देसी दम’, जानें क्या है DME तकनीक
पुणे/नई दिल्ली: भारत में पिछले कुछ दिनों से जारी रसोई गैस के संकट के बीच एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है पुणे स्थित CSIR-राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (NCL) के वैज्ञानिकों ने LPG का एक स्वदेशी और सस्ता विकल्प तैयार कर लिया है, जिसे ‘डाइमिथाइल ईथर’ (DME) कहा जाता है। यह तकनीक भविष्य में LPG सिलेंडरों की किल्लत को हमेशा के लिए खत्म कर सकती है।
क्या है यह नई तकनीक (DME)?
DME एक सिंथेटिक गैस है जिसे मेथनॉल से बनाया जाता है, इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके गुण काफी हद तक LPG से मिलते-जुलते हैं, लेकिन यह उससे कहीं अधिक स्वच्छ और किफायती है, वैज्ञानिकों ने एक विशेष स्वदेशी ‘कैटालिस्ट’ (Catalyst) विकसित किया है जो मेथनॉल को कुशलतापूर्वक ईंधन में बदल देता है।
बिना किसी बदलाव के आपके किचन में होगी सप्लाई
इस स्वदेशी ईंधन की सबसे राहत भरी बात यह है कि इसे अपनाने के लिए आपको अपना चूल्हा या सिलेंडर बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी:
- मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर: इसे वर्तमान LPG सिलेंडरों, रेगुलेटरों और पाइपों में आसानी से भरा और इस्तेमाल किया जा सकता है।
- मिश्रण (Blending): भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने LPG में 20% तक DME मिलाने की अनुमति पहले ही दे दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि 8% तक मिश्रण के लिए तो बर्नर में किसी भी बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
क्यों है यह भारत के लिए ‘गेम चेंजर’?
- आयात पर निर्भरता में कमी: भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% LPG आयात करता है, DME के उत्पादन से अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- सस्ता ईंधन: चूँकि इसे कोयले, बायोमास और मेथनॉल से बनाया जा सकता है, इसलिए यह बाजार में मिलने वाली LPG से सस्ता साबित हो सकता है।
- प्रदूषण मुक्त: यह जलते समय कालिख (Soot) और हानिकारक नाइट्रोजन या सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम करता है।
कब तक शुरू होगी सप्लाई?
पुणे के NCL में फिलहाल 250 किलोग्राम प्रतिदिन क्षमता वाला एक पायलट प्लांट सफलतापूर्वक चल रहा है, वैज्ञानिकों का लक्ष्य अगले 6 से 9 महीनों में 2.5 टन प्रतिदिन क्षमता वाला एक बड़ा प्रदर्शन संयंत्र (Demonstration Plant) तैयार करना है, सरकार और उद्योग जगत के सहयोग से इसे जल्द ही बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से लॉन्च करने की तैयारी है।
















