मध्य पूर्व के तनावपूर्ण हालात में भारत ने महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता हासिल की है। अमेरिका ने समुद्र में अटके ईरानी कच्चे तेल पर लगी पाबंदी हटाने का संकेत दिया है। इससे भारत को सस्ते दामों पर ईरानी तेल मिलने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। विशेषज्ञ इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इससे पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी आएगी।

Table of Contents
मध्य पूर्व संकट में भारत की रणनीति
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को हिला दिया है। समुद्र में फंसे ईरानी तेल टैंकरों की वजह से कच्चे तेल के दाम 69 डॉलर से बढ़कर 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। ऐसे में भारत ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ सीधी बातचीत कर अपने एलपीजी टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकलवाया। वीएलजीसी शिवालिक जैसे जहाजों को रास्ता मिलना भारत की कूटनीतिक क्षमता का प्रमाण है। ईरान ने दो और टैंकरों को अनुमति दी है जो गैस संकट को रोकने में मददगार साबित हो सकते हैं।
आम उपभोक्ता पर प्रभाव
पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरा दाम अभी नियंत्रण में हैं। प्रीमियम पेट्रोल में केवल दो से ढाई रुपये का मामूली इजाफा हुआ है। सरकार ने आश्वासन दिया है कि तेल कंपनियों के पास पर्याप्त स्टॉक है इसलिए कोई मूल्यवृद्धि नहीं होगी। तेल कंपनियां प्रतिदिन दो हजार करोड़ रुपये का नुकसान झेल रही हैं फिर भी स्थिरता बनाए रखने के लिए दामों को नियंत्रित रखा गया है। ईरानी तेल की उपलब्धता बढ़ने से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और घबराहट कम हो सकती है। लंबी अवधि में इससे पेट्रोल के दाम सौ रुपये प्रति लीटर से नीचे आने की संभावना है।
आने वाले खतरे और अवसर
हालांकि ईरान की ओर से तेल के दाम 200 डॉलर तक पहुंचने की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी तेल आवश्यकता का 85 प्रतिशत आयात पर निर्भर है इसलिए वैश्विक बाजार में उथल-पुथल का सीधा असर यहां पड़ता है। पाबंदी हटने से रूस के बाद ईरान भारत का दूसरा महत्वपूर्ण सस्ता तेल स्रोत बन सकता है। लेकिन यदि युद्ध लंबा खिंचा तो वैश्विक आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो सकती है। सरकार को रणनीतिक भंडार बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
















