
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के संशोधन के बाद देश में यह धारणा मजबूत हुई है कि बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों के समान ही अधिकार प्राप्त हैं, सुप्रीम कोर्ट के ‘विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा’ मामले के ऐतिहासिक फैसले ने भी इस पर मुहर लगाई है, लेकिन, कानून की बारीकियाँ कुछ और ही कहानी बयां करती हैं, कुछ ऐसी कानूनी स्थितियाँ भी हैं, जहाँ एक बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर दावा पूरी तरह खारिज किया जा सकता है।
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स्व-अर्जित संपत्ति और पिता की वसीयत
कानून के अनुसार, संपत्ति दो प्रकार की होती है, पैतृक और स्व-अर्जित। यदि संपत्ति पिता ने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी है (Self-acquired Property), तो वे इसके पूर्ण स्वामी हैं। पिता को यह अधिकार है कि वह अपनी इस संपत्ति को किसी को भी वसीयत (Will) कर दें। यदि पिता ने वसीयत के जरिए बेटी को बेदखल कर दिया है, तो वह अदालत में इसे चुनौती नहीं दे सकती।
2004 से पहले का कानूनी बंटवारा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 लागू होने से पहले, यानी 20 दिसंबर 2004 से पहले यदि संपत्ति का विधिवत कानूनी बंटवारा (Registered Partition) हो चुका है, तो उस पर नया नियम लागू नहीं होगा, ऐसी स्थिति में बेटी पुराने बंटवारे को रद्द कर नए सिरे से हिस्सा नहीं मांग सकती।
‘रिलीज डीड’ या हक का त्याग
अक्सर पारिवारिक समझौतों के तहत बेटियाँ स्वेच्छा से संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ देती हैं, यदि किसी बेटी ने कानूनी रूप से रिलीज डीड (Release Deed) या त्याग पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए हैं और वह दस्तावेज पंजीकृत है, तो भविष्य में वह दोबारा उस संपत्ति पर अपना हक नहीं जता पाएगी।
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जीवनकाल में संपत्ति का हस्तांतरण
यदि पिता ने अपने जीवित रहते ही संपत्ति को गिफ्ट डीड (Gift Deed) या बिक्री के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति (जैसे बेटा या अन्य रिश्तेदार) के नाम कर दिया है, तो वह संपत्ति उनकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकार की श्रेणी में नहीं आएगी, पिता के जीवित रहते उनकी निजी संपत्ति पर बेटी उन्हें बेचने या दान देने से नहीं रोक सकती।
पैतृक संपत्ति की सीमा
बेटी का जन्मसिद्ध अधिकार केवल पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) में होता है, जो दादा या परदादा से चली आ रही हो यदि संपत्ति केवल पिता की अपनी है, तो उनके जीवित रहते बेटी उस पर कोई दावा नहीं कर सकती पिता की मृत्यु के बाद ही (यदि वसीयत न हो) बेटी को ‘श्रेणी-1’ के उत्तराधिकारी के रूप में हिस्सा मिलता है।
संपत्ति के मामलों में अधिकारों के साथ-साथ कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, हालांकि कानून बेटियों के पक्ष में काफी मजबूत हुआ है, लेकिन ‘स्व-अर्जित संपत्ति’ और ‘पंजीकृत वसीयत’ जैसे कारक दावे को कमजोर कर सकते हैं, कानूनी जानकारों का सुझाव है कि किसी भी विवाद से बचने के लिए संपत्ति के दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
















