हर महीने ATM से पैसे निकालना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। बैंकों ने फ्री ट्रांजैक्शन की सीमा तय कर दी है और उसके बाद अतिरिक्त शुल्क लगाने शुरू कर दिए हैं। ये बदलाव ग्राहकों के लिए नया बोझ बन रहे हैं खासकर उन लोगों के लिए जो कैश पर ज्यादा निर्भर हैं। दिसंबर 2025 से लागू ये नियम बड़े बैंकों में दिखने लगे हैं और छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक असर डाल रहे हैं।

Table of Contents
फ्री लिमिट क्या है?
भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के मुताबिक मेट्रो शहरों में अपने बैंक के एटीएम से महीने में पांच फ्री कैश निकासी की अनुमति है। गैर-मेट्रो इलाकों में भी यही सीमा लागू है। लेकिन दूसरे बैंकों के एटीएम पर मेट्रो में सिर्फ तीन और गैर-मेट्रो में पांच फ्री ट्रांजैक्शन ही मिल पाते हैं। बैलेंस जांच जैसे गैर-वित्तीय लेनदेन भी इसी गिनती में आते हैं। लिमिट खत्म होते ही हर अतिरिक्त निकासी पर करीब 23 रुपये प्लस जीएसटी देना पड़ता है। पहले ये शुल्क थोड़ा कम था लेकिन अब बढ़ गया है।
चार्जेस का नया ढांचा
अब स्थिति ये है कि अगर आप महीने में छह बार अपने बैंक के एटीएम से पैसे निकालते हैं तो पांचवीं निकासी के बाद 23 रुपये का खर्चा अलग से आएगा। दूसरे बैंक के एटीएम पर ये सीमा और सख्त है। बैलेंस इंक्वायरी पर भी 10 रुपये के आसपास शुल्क लग सकता है। ये नियम सभी प्रमुख बैंकों पर लागू हो रहे हैं हालांकि कुछ बैंक अभी भी पुरानी दरें चला रहे हैं। औसत व्यक्ति जो महीने में सात-आठ बार एटीएम इस्तेमाल करता है उसके लिए ये हर महीने 50-100 रुपये का अतिरिक्त खर्च बन सकता है।
| ट्रांजैक्शन प्रकार | फ्री सीमा (मेट्रो/नॉन-मेट्रो) | अतिरिक्त शुल्क |
|---|---|---|
| अपने बैंक एटीएम | 5 / 5 | 23 रुपये + जीएसटी |
| दूसरे बैंक एटीएम | 3 / 5 | 23 रुपये + जीएसटी |
| बैलेंस जांच | शामिल | 10 रुपये + जीएसटी |
ग्राहकों पर क्या असर?
लुधियाना जैसे शहरों में जहां एटीएम की संख्या अच्छी है फिर भी लोग दूसरे बैंकों के मशीनों पर निर्भर हो जाते हैं। लंबी कतारें और मशीनों में खराबी के कारण ये समस्या बढ़ जाती है। छोटे व्यापारी और दैनिक मजदूर जो कैश में ही लेनदेन करते हैं उनके लिए ये शुल्क महंगा साबित हो रहा है। एक स्थानीय दुकानदार ने बताया कि अब वो ग्राहियों को यूपीआई से भुगतान करने को कहते हैं ताकि खुद का खर्चा न बढ़े। साल 2025 में डिजिटल भुगतान बढ़े हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में कैश की जरूरत अभी भी बनी हुई है।
बैंकों का पक्ष और समाधान
बैंकों का कहना है कि एटीएम चलाने का खर्चा बढ़ रहा है और धोखाधड़ी रोकने के लिए ये कदम जरूरी हैं। रखरखाव और सिक्योरिटी पर होने वाला व्यय ग्राहकों पर थोड़ा डालना पड़ रहा है। लेकिन ग्राहक इससे खुश नहीं हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बैंक ऐप से अपनी मासिक लिमिट चेक करें और अपने बैंक के एटीएम ही चुनें। सैलरी खाते वाले लोगों को कई बैंकों में अतिरिक्त फ्री ट्रांजैक्शन मिलते हैं। यूपीआई मोबाइल बैंकिंग और डेबिट कार्ड जैसे विकल्प अपनाकर इन शुल्कों से बचा जा सकता है।
भविष्य की उम्मीदें
ये बदलाव डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देने के इरादे से लगाए गए लगते हैं। पिछले साल यूपीआई लेनदेन में जबरदस्त उछाल आया था जबकि एटीएम उपयोग घटा है। फिर भी पूर्ण कैशलेस बनना अभी दूर की बात है। ग्राहकों को सतर्क रहना होगा और अपने बैंक से नियमित अपडेट लेते रहना चाहिए। क्या ये शुल्क लंबे समय तक चलेंगे या रिजर्व बैंक कोई राहत देगा ये समय बताएगा। फिलहाल सजगता ही सबसे बड़ा हथियार है।
















