देश की सबसे तेज और चमकदार ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस को हर भारतीय अपनी शान मानता है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर एक सवाल तूफान मचा रहा है- क्या ये ट्रेनें वाकई भारतीय रेलवे की हैं? या रेलवे हर साल अरबों रुपये का किराया किसी और को क्यों चुका रही है? यह बहस पुरानी है, लेकिन इसका जवाब समझने से रेलवे की स्मार्ट फाइनेंशियल रणनीति साफ हो जाती है। आइए, इस रहस्यमयी डील की परतें खोलते हैं।

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लीज मॉडल की शुरुआत कैसे हुई?
रेलवे को नई ट्रेनें लाने के लिए भारी पूंजी चाहिए होती है, जो सरकारी बजट से एक साथ जुटाना मुश्किल है। इसी समस्या का हल निकाला गया इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन के जरिए। यह रेल मंत्रालय की अपनी कंपनी है, जो बाजार से बॉन्ड बेचकर पैसा इकट्ठा करती है। इस पैसे से ट्रेनों का निर्माण होता है, ज्यादातर चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में। बनने के बाद ट्रेनें रेलवे को लंबी अवधि, यानी करीब 30 साल के लिए लीज पर सौंपी जाती हैं। इसका मतलब, कागजों पर मालिकाना हक इसी कंपनी के पास रहता है, लेकिन ट्रेनें चलाने, रखरखाव और यात्रियों की सेवा का पूरा जिम्मा रेलवे का होता है।
यह सिस्टम नया नहीं है। शताब्दी, राजधानी और गतिमान जैसी तमाम प्रीमियम ट्रेनें इसी तरह चल रही हैं। रेलवे की ज्यादातर पैसेंजर और मालगाड़ियां भी इसी मॉडल पर आधारित हैं। हर साल रेलवे इस लीज के बदले अच्छी-खासी रकम चुकाती है, जो बॉन्ड्स के ब्याज और मूल पूंजी की वापसी का हिस्सा होती है। अनुमान है कि यह राशि हजारों करोड़ में होती है, जो रेलवे के खर्च का बड़ा हिस्सा बन जाती है।
वंदे भारत का तेज सफर और इसके पीछे का सच
वंदे भारत की शुरुआत 2019 में हुई, जब पहली ट्रेन दिल्ली से वाराणसी पहुंची। तब से यह 50 से ज्यादा रूट्स पर दौड़ रही है, जिसमें अब स्लीपर वर्जन भी शामिल हो गए हैं। इनकी खासियत है 160 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार, वाई-फाई, आरामदायक सीटें और किफायती किराया। लेकिन सवाल वही है- आखिर रेलवे अपनी बनाई ट्रेनों पर किराया क्यों दे? जवाब सरल है। यह मॉडल रेलवे को बिना कर्ज के बोझ के तेजी से नेटवर्क बढ़ाने की ताकत देता है। अगर सीधे सरकारी खजाने से ट्रेनें खरीदी जातीं, तो प्रोजेक्ट सालों लटक जाते।
रेल मंत्री ने कई बार संसद में इसे रेलवे की सबसे बड़ी ताकत बताया है। अब लक्ष्य है सौ से ज्यादा वंदे भारत ट्रेनें लॉन्च करना। हाल के बजट में इस दिशा में भारी फंडिंग का ऐलान भी हुआ। लेकिन किराए का बोझ टिकटों पर असर डालता है, जिससे आम यात्री को महंगा पड़ता है।
विवादों का दौर और भविष्य की चुनौतियां
सोशल मीडिया पर इसे प्राइवेट कंपनी का खेल बताया जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह पूरी तरह सरकारी सिस्टम है। विपक्षी नेता संसद में चिल्ला चुके हैं कि रेलवे अपनी संपत्ति क्यों गंवा रही। कंपनी का कर्ज भी बढ़ता जा रहा है, जो चिंता का विषय है। आलोचक कहते हैं कि लंबे समय में यह बोझ असहनीय हो सकता है। फिर भी, समर्थक इसे वैश्विक प्रथा मानते हैं, जैसे हवाई कंपनियां प्लेन लीज पर उड़ाती हैं।
रेलवे को अब पारदर्शिता बढ़ानी होगी। किराया कम करने या मॉडल बदलने पर विचार हो सकता है। फिलहाल वंदे भारत यात्रियों की पहली पसंद बनी हुई है। यह ट्रेन न सिर्फ गति का प्रतीक है, बल्कि रेलवे की आर्थिक चतुराई का भी। लेकिन सवाल बना रहेगा- क्या यह डील यात्रियों के हित में है या सिर्फ आंकड़ों का खेल? समय ही बताएगा।
















