केंद्र सरकार ने केरल को नया नाम ‘केरलम’ देने की मंजूरी दे दी है, लेकिन पश्चिम बंगाल का ‘बांग्ला’ प्रस्ताव अभी भी लटका हुआ है। इस फैसले पर तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने केंद्र को घेर लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि केरल को इतनी तेजी से हरी झंडी क्यों, जबकि बंगाल के साथ अलग व्यवहार क्यों हो रहा है। यह विवाद राजनीतिक गलियारों में तेजी से फैल गया है।

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केंद्र का बड़ा फैसला
केंद्रीय कैबिनेट ने हाल ही में आयोजित बैठक में केरल विधानसभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। केरल सरकार ने करीब डेढ़ साल पहले इस नाम परिवर्तन का प्रस्ताव भेजा था। राज्य के नेता इसे मलयालम भाषा की मूल ध्वनि को प्रतिबिंबित करने वाला कदम बता रहे हैं। यह बदलाव राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि यह फैसला आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आया। कई जानकार इसे चुनावी माहौल से प्रेरित मान रहे हैं। अब आधिकारिक दस्तावेजों में केरल की जगह केरलम लिखा जाएगा।
ममता बनर्जी का गुस्सा
ममता बनर्जी ने एक सार्वजनिक सभा में खुलकर केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि बंगाल विधानसभा ने कई बार नाम बदलने का प्रस्ताव पारित किया, लेकिन केंद्र ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया। उनके अनुसार, यह भेदभाव साफ दिख रहा है। ममता ने जोर देकर कहा कि बंगाली भाषा और संस्कृति के लिए ‘बांग्ला’ नाम महत्वपूर्ण है। उन्होंने केंद्र से तत्काल कार्रवाई की मांग की। उनके समर्थक इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतर आए। सोशल मीडिया पर भी यह चर्चा का केंद्र बन गया।
पुराना विवाद फिर उफान पर
बंगाल का प्रस्ताव कई वर्ष पुराना है। राज्य सरकार ने इसे भाषाई शुद्धता के आधार पर उठाया था। लेकिन तकनीकी कारणों या अन्य वजहों से यह अटका पड़ा। विपक्ष के नेताओं का मानना है कि केंद्र कुछ राज्यों के प्रति नरम है, जबकि अन्य के साथ सख्ती बरत रहा। केरल में सत्ताधारी दल और केंद्र के संबंधों को इसकी वजह बताया जा रहा। ममता ने इसे राजनीतिक बदले की भावना से जोड़ा। उन्होंने चेतावनी दी कि बंगाल की पहचान से छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं होगी।
राजनीतिक निहितार्थ
यह मुद्दा अब चुनावी रंग ले चुका है। बंगाल में तृणमूल मजबूत स्थिति में है, जबकि केरल में सत्ता परिवर्तन की चर्चा चल रही। विश्लेषकों का कहना है कि नाम परिवर्तन जैसे फैसले क्षेत्रीय दलों को मजबूत करने का जरिया बन सकते हैं। केंद्र की चुप्पी ने विवाद को और हवा दी। गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि सभी प्रस्तावों पर विचार जारी है। लेकिन समय लग सकता है।
भाषा और पहचान का सवाल
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राज्य नाम भाषा से गहराई से जुड़े होते हैं। केरल का फैसला सकारात्मक उदाहरण लगता है। लेकिन बंगाल का मामला असंतुलन पैदा कर रहा। ममता ने इसे संघीय ढांचे पर सवाल ठहराया। विशेषज्ञों का मत है कि ऐसी मांगों को जल्द संबोधित करना चाहिए। अन्य राज्य भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे। क्या यह विवाद संसद तक पहुंचेगा, यह समय बताएगा। फिलहाल, नामों की जंग ने राजनीति को गर्म कर दिया है।
















