
दुनिया भर में रविवार का दिन आराम, परिवार और मनोरंजन का पर्याय बन चुका है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सप्ताह के सातों दिनों में से रविवार को ही छुट्टी के लिए क्यों चुना गया? इसके पीछे केवल धार्मिक कारण नहीं, बल्कि भारत के मजदूर आंदोलनों का एक लंबा और प्रेरणादायक इतिहास छिपा है।
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मजदूरों के मसीहा ने लड़ी 7 साल लंबी लड़ाई
भारत में रविवार की छुट्टी का श्रेय नारायण मेघाजी लोखंडे को जाता है, जिन्हें भारतीय श्रम आंदोलन का जनक माना जाता है, ब्रिटिश शासन के दौरान मिल मजदूरों को बिना किसी विश्राम के सातों दिन काम करना पड़ता था, लोखंडे का मानना था कि हफ्ते के छह दिन पेट पालने के लिए काम करने के बाद, सातवां दिन समाज और देश सेवा के लिए समर्पित होना चाहिए।
उन्होंने 1881 में इसके खिलाफ आवाज उठाई, जो करीब 7 साल तक चली, आखिरकार, उनके कड़े संघर्ष के आगे झुकते हुए ब्रिटिश सरकार ने 10 जून 1890 को रविवार को आधिकारिक साप्ताहिक अवकाश घोषित किया।
धार्मिक और वैश्विक कनेक्शन
रविवार की छुट्टी के पीछे ब्रिटिश नजरिया थोड़ा अलग था। ईसाई धर्म में रविवार को ‘प्रार्थना का दिन’ (Sabbath) माना जाता है। अंग्रेज अधिकारी इस दिन चर्च जाकर प्रार्थना करते थे, लोखंडे ने इसी आधार पर तर्क दिया कि भारतीय मजदूरों को भी अपने ईष्ट देवों और सामाजिक कार्यों के लिए एक दिन की मोहलत मिलनी चाहिए।
केवल छुट्टी ही नहीं, मिले कई और अधिकार
लोखंडे के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन का असर केवल छुट्टी तक सीमित नहीं रहा, इसी संघर्ष की बदौलत मजदूरों को दोपहर में आधे घंटे के लंच ब्रेक की सुविधा भी प्राप्त हुई, इससे पहले मजदूरों को लगातार शिफ्ट में काम करना पड़ता था।
वैश्विक मानक और स्कूल
गौरतलब है कि मजदूरों से पहले, साल 1844 में ही स्कूली छात्रों के लिए रविवार की छुट्टी का प्रावधान किया गया था, वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) भी रविवार को सप्ताह का अंतिम दिन और वैश्विक अवकाश के रुप में मान्यता देता है।
















