मिडिल ईस्ट में भड़के ईरान-इजरायल संघर्ष ने भारत के किसानों के सामने नया खतरा खड़ा कर दिया है। खरीफ की फसल बोआई से ठीक पहले यूरिया जैसे महत्वपूर्ण उर्वरक के उत्पादन में कमी और वैश्विक बाजार में कीमतों के आसमान छूने से खेतों पर संकट मंडरा रहा है। गैस आपूर्ति बाधित होने से घरेलू कारखाने उत्पादन घटाने को मजबूर हैं, जिससे किसान भाइयों की चिंता बढ़ गई है।

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युद्ध का असर
भारत में यूरिया का अधिकांश उत्पादन प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। मिडिल ईस्ट के तनावपूर्ण हालातों ने गैस के आयात को महंगा और अनिश्चित बना दिया है। खाड़ी देशों से आने वाली आपूर्ति में व्यवधान पड़ने से कारखानों को अपनी क्षमता कम करनी पड़ी है। कई इकाइयां घाटे से बचने के लिए संचालन के घंटे घटा रही हैं। नतीजतन, बाजार में यूरिया की उपलब्धता पर सवाल उठने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी कीमतें तेजी से चढ़ रही हैं, जो भारत जैसे आयातक देश के लिए बड़ी चुनौती है।
स्टॉक की स्थिति
सरकारी स्तर पर खरीफ सीजन के लिए भंडारण को मजबूत किया गया है। देश में यूरिया सहित विभिन्न उर्वरकों का पर्याप्त बफर स्टॉक जमा है, जो अगले कुछ हफ्तों की मांग आसानी से पूरी कर सकता है। पिछले वर्षों की तुलना में यह मात्रा काफी अधिक है। हालांकि, यदि संघर्ष लंबा खिंचा तो आयात मार्गों पर दबाव बढ़ेगा। समुद्री रास्तों की सुरक्षा अभी बरकरार है, लेकिन लंबी अवधि में स्थिति जटिल हो सकती है।
किसानों पर पड़ने वाला बोझ
उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। सरकार अधिकृत दरें नियंत्रित रखेगी, लेकिन बढ़ती लागत से सब्सिडी खर्च फूल सकता है। भविष्य में नीतिगत बदलाव जैसे लक्षित वितरण या कोटा प्रणाली सख्त हो सकती है। धान, गन्ना और अन्य नाइट्रोजन-गहन फसलों पर असर सबसे ज्यादा पड़ेगा। उत्तर भारत के गन्ना बेल्ट और पूर्वी मैदानों में किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे। डीएपी और अन्य उर्वरकों की कीमतें भी ऊंचाई की ओर हैं।
क्या करें किसान, व्यावहारिक सलाह
घबराहट में जमाखोरी से बचें, क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर कृत्रिम कमी पैदा हो सकती है। मिट्टी परीक्षण कराकर उर्वरक की सटीक मात्रा तय करें। संतुलित खेती अपनाएं यूरिया के साथ एनपीके, जैविक खाद और हरी खाद का मिश्रण इस्तेमाल करें। ड्रिप और स्प्रिंकलर से बचत सुनिश्चित करें। दालों जैसी फसलों का चक्र अपनाकर मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन बढ़ाएं। स्थानीय कृषि केंद्रों और हेल्पलाइन से नियमित संपर्क रखें।
आगे की राह, सतर्कता जरूरी
सरकार आयात बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों पर नजर रख रही है। नैनो यूरिया और हरित खेती को बढ़ावा देकर निर्भरता घटानी होगी। मिडिल ईस्ट में शांति ही स्थायी समाधान है। तब तक किसान सतर्क रहकर खेती की रणनीति में बदलाव लाएं। यह संकट अस्थायी हो सकता है, लेकिन तैयारी ही सफलता की कुंजी है।
















