भारत की धरती पर सबसे बड़ा मालिक तो केंद्र सरकार ही है। इसके पास इतनी जमीन फैली हुई है कि कई छोटे देश इसके आगे फीके पड़ जाते हैं। रेलवे से लेकर रक्षा क्षेत्र तक, हर कोने में सरकारी संपत्ति का दबदबा दिखता है। लेकिन जब बात निजी या संस्थागत स्वामित्व की आती है, तो चौंकाने वाले नाम सामने आते हैं।

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सरकारी दिग्गजों की जमीन
देश का कुल भूभाग विशाल है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा सरकारी ताले में बंद है। रेल मंत्रालय इस सूची में सबसे ऊपर है। इसके ट्रैक, स्टेशन और जमीनें पूरे देश में फैली हैं। रक्षा मंत्रालय भी पीछे नहीं। कैंटोनमेंट इलाके, एयरबेस और ट्रेनिंग ग्राउंड इसके नाम पर दर्ज हैं। कोयला, ऊर्जा और शिपिंग जैसे विभाग भी लाखों एकड़ पर कब्जा जमाए हुए हैं। ये संपत्तियां विकास, सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी हैं। फिर भी, इनका रखरखाव और उपयोग हमेशा सवालों के घेरे में रहता है।
दूसरा नंबर का सरप्राइज
सरकार के बाद जो नाम सबसे ज्यादा चमकता है, वो है कैथोलिक चर्च। ब्रिटिश दौर से चली आ रही इस संस्था के पास अनुमान से कहीं ज्यादा जमीन है। स्कूल, अस्पताल, कन्वेंट और प्रार्थना स्थल इसके नाम पर फैले हैं। दक्षिण भारत से लेकर पूर्वोत्तर तक इसका नेटवर्क मजबूत है। ये संपत्तियां टैक्स से मुक्त हैं, जो इन्हें और ताकतवर बनाती हैं। चर्च न तो खेती करता है, न कारोबार, फिर भी इतना बड़ा साम्राज्य कैसे खड़ा हो गया? इतिहास इसके पीछे मिशनरी काम और पुरानी जमीन दान का हाथ है। आज ये भारत की सबसे प्रभावशाली गैर-सरकारी ताकत बन चुकी है।
तीसरे पायदान पर वक्फ
इसके बाद आता है वक्फ बोर्ड। मुस्लिम समुदाय की यह संस्था धार्मिक और कल्याणकारी कामों के लिए जमीनें संभालती है। लाखों प्रॉपर्टी इसके पास हैं, जिनमें मस्जिदें, कब्रिस्तान और मदरसे शामिल हैं। हर राज्य में अलग बोर्ड इसे संचालित करता है। कानूनी रूप से ये संपत्तियां स्थायी हैं, मतलब इन्हें बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इसकी कीमत अरबों में है, जो समाज सेवा के नाम पर जमा हुई। लेकिन प्रबंधन में पारदर्शिता को लेकर बहस छिड़ी रहती है। रेलवे और रक्षा के बाद यह तीसरा सबसे बड़ा होल्डर है।
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जमीनों का विवाद और भविष्य
ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की जमीनें ज्यादातर संस्थाओं के पास हैं, न कि व्यक्तिगत अरबपतियों के। लेकिन सच्चाई सामने लाने में चुनौतियां हैं। रिकॉर्ड पुराने हैं, सर्वे अधूरे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म से अब सुधार हो रहा है, मगर पूर्ण पारदर्शिता दूर है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बंजर पड़ी इन संपत्तियों को विकास में लगाया जाए तो अर्थव्यवस्था मजबूत हो। चर्च और वक्फ पर टैक्स या ऑडिट की मांग बढ़ रही है। सरकार भूमि सुधारों पर नजर रखे हुए है। क्या ये जमींदार देश के विकास में साथ देंगे या रुकावट बनेंगे?
समाज के लिए सबक
ये कहानी सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि शक्ति और जिम्मेदारी की है। जब कोई संस्था इतना बड़ा संसाधन संभालती है, तो उसके उपयोग पर सवाल उठना लाजमी है। आम आदमी के लिए यह सीख है कि संपत्ति का बोझ अधिकार के साथ आता है। आने वाले दिनों में कानूनी बदलाव इनके स्वरूप को नया रंग दे सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में जमीन संसाधन है, इसे बर्बाद करने का वक्त नहीं।
















