
आज के डिजिटल दौर में क्रेडिट कार्ड रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन शॉपिंग से लेकर ट्रैवल बुकिंग और मेडिकल इमरजेंसी तक, लोग रिवॉर्ड पॉइंट्स, कैशबैक और EMI की सुविधा के चलते इसका खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन एक सवाल हमेशा मन में कौंधता है- अगर क्रेडिट कार्ड होल्डर की अचानक मौत हो जाए, तो बकाया बिल का क्या होगा? क्या परिवार को अपनी जेब से चुकाना पड़ेगा या बैंक खुद निपटारा करेगा? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि भारत में क्रेडिट कार्ड बकाया 2.91 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है।
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कानूनी आधार: कर्ज व्यक्तिगत देनदारी
क्रेडिट कार्ड एक असुरक्षित ऋण (unsecured loan) है, जो केवल कार्ड होल्डर की व्यक्तिगत जिम्मेदारी होता है। होल्डर की मृत्यु पर यह कर्ज परिवार के सदस्यों पर सीधे ट्रांसफर नहीं होता। पत्नी, बच्चे या माता-पिता को अपने पैसे से भुगतान करने की बाध्यता नहीं है। बैंक का पहला कदम मृतक की संपत्ति (estate) का आकलन करना होता है। इसमें बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), प्रॉपर्टी, शेयर, म्यूचुअल फंड या अन्य निवेश शामिल हैं। कानूनन, बैंक को इन संपत्तियों से पहले वसूली का अधिकार है, उसके बाद ही वारिसों को हिस्सा मिलता है।
उदाहरण के लिए, अगर मृतक के नाम पर 50 लाख की प्रॉपर्टी और 10 लाख का क्रेडिट कार्ड बकाया है, तो बैंक प्रॉपर्टी बेचकर या FD ब्रेक करके अपना पैसा वसूल लेगा। बची रकम ही परिवार को मिलेगी।
वसूली प्रक्रिया: लीगल हेयर की भूमिका
मृत्यु की सूचना मिलते ही बैंक लीगल हेयर (कानूनी वारिस) की जांच शुरू करता है। अगर मृतक ने वसीयत (will) बनाई है, तो उसमें नामित एक्जीक्यूटर (executor) संपत्ति संभालता है। एक्जीक्यूटर को सबसे पहले कर्ज चुकाना होता है, फिर शेष संपत्ति वितरित करता है। वसीयत न होने पर कोर्ट एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त करता है, जो वही काम करता है।
RBI दिशानिर्देश साफ कहते हैं कि बैंक परिवार को सीधे नोटिस नहीं ठोक सकता। अगर संपत्ति कम हो या न हो, तो बकाया राइट-ऑफ (bad debt) में चला जाता है। ऐसी स्थिति में परिवार को कोई बोझ नहीं उठाना पड़ता। 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, कई बैंक ऐसे मामलों में 20-30% बकाया को राइट-ऑफ करते हैं।
जॉइंट और सप्लीमेंट्री कार्ड
जॉइंट कार्ड (जैसे पति-पत्नी दोनों साइन) में सह-धारक पर पूरा बकाया आ जाता है। प्राइमरी होल्डर की मौत पर भी को-होल्डर जिम्मेदार रहता है। वहीं, सप्लीमेंट्री कार्ड (परिवार के लिए अतिरिक्त) पर केवल प्राइमरी होल्डर की जिम्मेदारी होती है। मौत के बाद सप्लीमेंट्री कार्ड निष्क्रिय हो जाता है।
विशेषज्ञ सलाह: बचाव के उपाय
वित्तीय विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि क्रेडिट कार्ड लेते समय विल जरूर बनाएं। इससे संपत्ति वितरण स्पष्ट होता है। नामिनी अपॉइंट करें, लेकिन समझें कि वह क्रेडिट कार्ड कर्ज से बंधा नहीं। हमेशा बिल समय पर चुकाएं ताकि ब्याज बम न फूटे। RBI के अनुसार, क्रेडिट कार्ड पर 36-48% सालाना ब्याज लग सकता है।
RBI और कानूनी ढांचा
भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act) और उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के तहत कर्ज मृतक की संपत्ति तक सीमित रहता है। RBI की फेयर प्रैक्टिस कोड परिवार को उत्पीड़न से बचाती है। अगर बैंक दबाव डाले, तो बैंकिंग लोकपाल से शिकायत करें।
क्रेडिट कार्ड सुविधा है, लेकिन जिम्मेदारी भी। मौत के बाद परिवार सुरक्षित रहता है, बशर्ते संपत्ति से वसूली हो सके। लाखों भारतीय इस भ्रम में जीते हैं कि कर्ज परिवार पर आ जाएगा। सच्चाई जानकर ही वित्तीय स्वतंत्रता मिलती है।
















