
भूमि अधिग्रहण के मामलों में मुआवजे की लेटलतीफी पर अदालतों ने अब बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है, हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक हित के नाम पर नागरिकों की संपत्ति लेना केवल कब्जा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें समय पर उचित मुआवजा देना सरकार की ‘पूर्ण जिम्मेदारी’ है।
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कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘जमीन लेना ही काफी नहीं’
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि एक बार जब नागरिक से जमीन ले ली जाती है, तो मुआवजे का निर्धारण और भुगतान करने का दायित्व ‘पूर्ण’ (Absolute) हो जाता है अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 300A किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित करने की अनुमति तभी देता है जब कानून की उचित प्रक्रिया का पालन हो, और इस प्रक्रिया में मुआवजे का भुगतान अनिवार्य रूप से शामिल है।
लेख की मुख्य जानकारियां
- कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के मामलों में ‘सिस्टम की विफलता’ पर नाराजगी जताते हुए सरकार को ‘मिशन मोड’ में काम करने और मुआवजे की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का आदेश दिया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि मुआवजा केवल जमीन की कीमत नहीं, बल्कि मालिक के नुकसान की भरपाई है। इसलिए, अधिग्रहण की तारीख से ही मुआवजा और उस पर कानूनी ब्याज मिलना शुरू हो जाना चाहिए।
- कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि मुआवजे के भुगतान में देरी होती है, तो संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। कुछ मामलों में तो मुआवजे की अदायगी न होने पर अधिकारियों की संपत्तियां कुर्क करने तक की नौबत आ गई है।
- अदालतों ने कहा कि सरकार इस बात का फायदा नहीं उठा सकती कि कई भूस्वामी (विशेषकर किसान और अनपढ़ लोग) औपचारिक कार्यवाही या कानूनी पेचीदगियों से वाकिफ नहीं हैं।
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सरकारी तंत्र को अल्टीमेटम
अदालतों ने अब जिला-वार डेटाबेस तैयार करने और उन मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है जहां कब्जा तो ले लिया गया है लेकिन वर्षों से अवार्ड पास नहीं हुआ है सरकार को सख्त लहजे में कहा गया है कि वह ‘जनता की मालिक नहीं, बल्कि सेवक’ है और मुआवजे के मामलों में उदासीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
















