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नींबू के दाम में लगी आग! ₹200 प्रति किलो के पार पहुंचा रेट; गर्मी शुरू होते ही आम आदमी की थाली से गायब हुआ ‘खट्टा’

गर्मी की दस्तक से नींबू के दाम 200 रुपये किलो के पार! थाली से गायब हुआ खट्टा स्वाद, सप्लाई चेन लड़खड़ाई। अप्रैल में क्या होगा और बुरा? आम आदमी की मुश्किलें बढ़ेंगी या राहत मिलेगी?

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गर्मी ने जैसे ही दस्तक दी, बाजारों में नींबू के दामों ने आग पकड़ ली। राजस्थान के सीकर जैसे शहरों में थोक मंडी में यह 200 रुपये प्रति किलो बिक रहा है, जबकि खुदरा दुकानों पर 215 रुपये तक पहुंच गया। मध्य प्रदेश के इंदौर में तो हालात और खराब हैं, जहां भाव 250 रुपये किलो को छू चुके। गुजरात के अहमदाबाद और आंध्र के गुंटूर जैसे बाजारों में भी पिछले दस दिनों में कीमतें चार गुना उछल चुकीं। आम आदमी अब दाल चावल के साथ खट्टा स्वाद भूलने को मजबूर है।

नींबू के दाम में लगी आग! ₹200 प्रति किलो के पार पहुंचा रेट; गर्मी शुरू होते ही आम आदमी की थाली से गायब हुआ 'खट्टा'

मांग और सप्लाई का बड़ा संकट

गर्मी बढ़ते ही शिकंजी, नींबू पानी और सलाद की डिमांड आसमान छूने लगी। तापमान 41 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया, जिससे हर घर हर ढाबे पर नींबू की होड़ मच गई। लेकिन सप्लाई चेन पूरी तरह लड़खड़ा गई। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र से ट्रकों की आवक बेहद कम हो चुकी। स्थानीय किसानों के पास व्यावसायिक स्तर पर खेती कम होने से उत्तर भारत को बाहर पर निर्भरता बढ़ गई। ऊंचा परिवहन खर्च और शादी ब्याह का सीजन ने हालात बिगाड़ दिए। फसल पर कीटों का प्रकोप भी उत्पादन को 30 प्रतिशत तक घटा चुका।

आम उपभोक्ता पर भारी पड़ी महंगाई

मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट पर सबसे ज्यादा असर पड़ा। मेरठ के सदर बाजार में एक दर्जन नींबू के लिए अब 180 से 200 रुपये चुकाने पड़ रहे, जो एक महीने पहले महज 50 रुपये के आसपास था। सब्जी विक्रेता रामेश्वर कहते हैं कि लोग सलाद बनाना बंद कर चुके। होटलों ने प्लेटों में नींबू की मात्रा आधी कर दी, जिससे ग्राहक नाराज हैं। खुदरा खपत में 20 प्रतिशत गिरावट आ गई, जबकि कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री बढ़ रही। गरीब घरों में तो नींबू पूरी तरह गायब हो चुका, जो विटामिन सी का बड़ा स्रोत है। गर्मी में इम्यूनिटी कमजोर होने का खतरा बढ़ गया।

क्या हैं मुख्य वजहें

जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून ने फसल को चपेट में ले लिया। दक्षिण से आने वाले माल में देरी हो रही, क्योंकि सड़कें गर्मी और ट्रैफिक से जाम। व्यापारी विजय सिंह बताते हैं कि फसल पकने में असमानता ने गुणवत्ता प्रभावित की। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर खेती न होने से यह समस्या हर साल दोहराई जाती है।

आगे क्या होगा?

अप्रैल मई में यदि दक्षिण से सप्लाई न सुधरी तो भाव 250 से 300 रुपये तक जा सकते। किसानों को प्रोत्साहन देकर व्यावसायिक खेती बढ़ानी होगी। सरकार को आयात या सब्सिडी पर विचार करना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में जंगली नींबू जैसे विकल्प अपनाए जा रहे, लेकिन शहरों में हालात चिंताजनक हैं।

यह महंगाई कृषि व्यवस्था की कमजोरी को उजागर कर रही। समय रहते कदम उठे तो गर्मी की इस आग में राहत मिल सकती। वरना आमजन की थाली लंबे समय तक फीकी रहेगी।

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info@nitap.in

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