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कंचनजंगा सबसे ऊंचा तो सबसे ‘निचला’ हिस्सा कौन? भारत का ‘नीदरलैंड’ कहलाता है यह इलाका, समुद्र तल से नीचे होती है खेती

समुद्र तल से नीचे खेती! जानिए 'नीदरलैंड' कहलाने वाले इस भारतीय इलाके का राज, जहां प्रकृति ने खेला कमाल!

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भारत की जमीन विविधता का अनमोल खजाना है। एक तरफ हिमालय की बर्फीली चोटियां स्वर्ग छूती नजर आती हैं, तो दूसरी ओर दक्षिण के मैदानी इलाके पानी के नीचे खेती का चमत्कार रचते हैं। सबसे ऊंची कंचनजंगा से लेकर सबसे निचले कुट्टनाड तक, ये क्षेत्र देश की प्राकृतिक शक्ति और मानवीय संघर्ष की कहानी बयां करते हैं।

कंचनजंगा सबसे ऊंचा तो सबसे 'निचला' हिस्सा कौन? भारत का 'नीदरलैंड' कहलाता है यह इलाका, समुद्र तल से नीचे होती है खेती

कंचनजंगा

हिमालय की गोद में बसी कंचनजंगा भारत का सबसे ऊंचा पर्वत शिखर है। इसकी चोटी समुद्र तल से करीब 8600 मीटर ऊपर है। सिक्किम और नेपाल की सीमा पर स्थित यह पर्वत पांच भुजाओं वाला प्रतीत होता है, जिस कारण स्थानीय लोग इसे पंचांगरी या पवित्र चोटी मानते हैं। आसपास का राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता से भरा पड़ा है। यहां हिम तेंदुए, लाल पांडा और सैकड़ों दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। ट्रेकर्स के लिए यह स्वप्निल जगह है, लेकिन ऊंचाई के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। प्रकृति प्रेमी इसे देवताओं का घर मानकर सम्मान देते हैं। जलवायु परिवर्तन से यहां ग्लेशियर पिघलने की आशंका बढ़ गई है।

कुट्टनाड

दक्षिण की ओर मुड़ें तो केरल का कुट्टनाड आंखें चौंकाने वाला इलाका है। यह समुद्र तल से दो से तीन मीटर नीचे फैला डेल्टा क्षेत्र है। अलप्पुझा जिले में बसा यह भाग चार प्रमुख नदियों से सींचा जाता है। वेम्बनाड झील के किनारे बसे खेत साल में तीन बार धान उपजाते हैं। भारत में कहीं और ऐसा नहीं होता। किसान पानी भरकर खेती करते हैं ताकि खारा समुद्री पानी खेतों तक न पहुंचे। यह अनोखी पद्धति सदियों पुरानी है। हरे भरे खेतों के बीच नारियल के पेड़ और पारंपरिक घरबोटें दृश्य को स्वप्निल बनाती हैं।

नीदरलैंड सरीखा जल प्रबंधन का जादू

कुट्टनाड को भारत का नीदरलैंड कहा जाता है क्योंकि यहां नहरें, बांध और जलरोधी दीवारें समुद्र के आक्रमण को रोकती हैं। विशाल बांध खारे पानी को मीठे जल से अलग रखते हैं। किसान खेतों को रणनीतिक रूप से भरते-खाली करते हैं। यह व्यवस्था न केवल बाढ़ से बचाती है बल्कि उपज बढ़ाती भी है। वैश्विक स्तर पर इसे कृषि का अनुपम उदाहरण माना जाता है। पर्यटक स्नेक बोट दौड़ देखने आते हैं, जो स्थानीय संस्कृति का हिस्सा है। हालांकि, समुद्र स्तर बढ़ने से चुनौतियां बढ़ रही हैं।

दोनों क्षेत्रों की साझा चुनौतियां

कंचनजंगा पर ग्लेशियर पिघलाव का खतरा मंडरा रहा है, वहीं कुट्टनाड में बाढ़ और खारापन किसानों को परेशान कर रहा है। सरकार ने विशेष योजनाओं से सहायता पहुंचाई है। कुट्टनाड के लिए आधुनिक बांध और जल निकासी परियोजनाएं चल रही हैं। ऊपर हिमालय में संरक्षण के प्रयास तेज हैं। ये इलाके सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना ही भविष्य है।

भविष्य के सबक

भारत की ये दो विपरीत दुनिया एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ऊंचाई पर जीवन की कठिनाई और निचले स्तर पर जुझारूपन देश की ताकत दिखाता है। सतत विकास से इन्हें संरक्षित किया जा सकता है। पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है। ये क्षेत्र न केवल गर्व का विषय हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी।

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info@nitap.in

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