
राजस्थान हाई कोर्ट ने विरासत और संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक ऐसा क्रांतिकारी फैसला सुनाया है, जिसने प्रदेश सहित पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति (Self-acquired Property) पर शादीशुदा और बालिग बच्चों का कोई कानूनी दावा नहीं बनता, अदालत की इस टिप्पणी ने ‘विरासत’ की परंपरागत परिभाषा को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
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‘अनुमति से रहना हक नहीं’
जस्टिस पंकज भंडारी की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चे अपने माता-पिता के घर में सिर्फ उनकी सहमति और प्यार की वजह से रहते हैं, इसे कानून की भाषा में ‘परमिसिव पजेशन’ (Permissive Possession) कहा जाता है, कोर्ट ने साफ किया कि अगर पिता चाहे तो वह किसी भी समय अपने बच्चों को घर से बाहर निकाल सकता है और बच्चे इसे अपना अधिकार बताकर चुनौती नहीं दे सकते।
बुजुर्ग पिता को परेशान करने पर ₹1 लाख का जुर्माना
यह फैसला ‘रितेश खत्री बनाम अन्य’ के मामले में आया, जहां एक बेटे ने अपने बुजुर्ग पिता की संपत्ति पर कब्जा जमा रखा था और उन्हें ही घर से बेदखल करने की कोशिश कर रहा था, अदालत ने न केवल बेटे की याचिका को खारिज किया, बल्कि बुजुर्ग पिता को मानसिक और कानूनी प्रताड़ना देने के जुर्म में बेटे पर 1 लाख रुपये का भारी जुर्माना भी ठोक दिया।
फैसले की 3 बड़ी बातें जो आपको जाननी चाहिए
- यदि संपत्ति पिता ने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी है, तो वह उसे किसे देगा या किसे घर में रखेगा, यह पूरी तरह उसका निर्णय है।
- बालिग होने या शादी होने के बाद बच्चा यह दावा नहीं कर सकता कि उसे पिता के घर में रहने का ‘जन्मजात अधिकार’ है।
- यह फैसला ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण अधिनियम’ को और मजबूती देता है, जिससे बुजुर्गों को अपने ही घर में सुरक्षित महसूस हो सके।
क्या पैतृक संपत्ति पर भी लागू होगा यह नियम?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला केवल स्वयं अर्जित (Self-acquired) संपत्ति के लिए है। जो संपत्ति दादा-परदादा के समय से चली आ रही है यानी पैतृक संपत्ति (Ancestral Property), उस पर बच्चों का अधिकार कानूनन बरकरार रहेगा, इस फैसले के बाद अब यह साफ संदेश गया है कि बच्चों को माता-पिता की संपत्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की राह बनानी होगी, अन्यथा उन्हें बेदखली का सामना करना पड़ सकता है।
















