
भारत की सड़कों पर तेज रफ्तार और लापरवाही भरी ड्राइविंग के कारण हर साल हजारों जानें जा रही हैं। इनमें से एक बड़ा हिस्सा नाबालिगों का है, जो बिना लाइसेंस और ट्रेनिंग के कार, बाइक या स्कूटी दौड़ाते हैं। मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 199A के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चे को ड्राइविंग की अनुमति देना गंभीर अपराध है। अगर नाबालिग एक्सीडेंट करता है, तो पूरी जिम्मेदारी उसके माता-पिता या वाहन मालिक पर आती है। सरकार इसे अभिभावकों की लापरवाही मानती है, क्योंकि बच्चा बिना उनकी मिलीभगत के वाहन नहीं चला सकता।
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3 साल जेल और 25 हजार का जुर्माना
मोटर व्हीकल एक्ट के अनुसार, नाबालिग द्वारा वाहन चलाने पर अभिभावक या मालिक को 3 साल तक की कैद और 25,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। हाल ही में दिल्ली के द्वारका में एक नाबालिग ने स्कॉर्पियो से बाइक सवार की टक्कर मारकर हत्या कर दी। आरोपी के पिता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, जिसमें यही धाराएं लगाई गई हैं। वाहन का रजिस्ट्रेशन 12 महीने के लिए रद्द हो जाता है, यानी एक साल तक गाड़ी सड़क पर नहीं चलेगी। बीमा क्लेम भी खारिज हो जाता है, जिससे मरम्मत का पूरा खर्च मालिक की जेब से कटता है।
अगर अभिभावक साबित कर दें कि बच्चे ने चोरी-छिपे चाबी ले ली, तो कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन ज्यादातर मामलों में पुलिस इसे स्वीकार नहीं करती, क्योंकि कानून सहमति मानकर चलता है। यूपी के सहारनपुर में एक केस में माता-पिता को जेल और 25,000 रुपये का जुर्माना लग चुका है।
नाबालिग का भविष्य खतरे में
हादसे में फंसे नाबालिग को भी सजा मिलती है। नए नियमों के तहत उसे 25 साल की उम्र तक ड्राइविंग लाइसेंस या लर्नर लाइसेंस पाने से अयोग्य घोषित किया जा सकता है। जहां सामान्य बच्चे 18 साल में लाइसेंस ले लेते हैं, वहीं अपराधी को 7 साल इंतजार करना पड़ता है। छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में यह नियम सख्ती से लागू हो रहा है।
गंभीर अपराध में नाबालिग को वयस्क जैसी सजा?
आम तौर पर नाबालिग के केस जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) में जाते हैं, जहां काउंसलिंग या कम्युनिटी सर्विस होती है। लेकिन अगर उम्र 16-18 साल है और अपराध गंभीर- जैसे नशे में ड्राइविंग या हत्या- तो JJB उसे ‘वयस्क’ घोषित कर सकता है। ऐसे में IPC की धारा 304A (गैर-इरादतन हत्या) के तहत सामान्य अदालत में ट्रायल होता है, और जेल की सजा हो सकती है। पुणे Porsche केस इसका उदाहरण है।
क्यों बढ़ रहे ऐसे हादसे?
भारत में नाबालिग ड्राइविंग केस बढ़ रहे हैं, खासकर शहरी इलाकों में। माता-पिता बच्चे को ‘बड़ा समझ’कर चाबी सौंप देते हैं, लेकिन ट्रेनिंग के अभाव में ये लापरवाही घातक साबित होती है। सड़क परिवहन मंत्रालय ने 2025 से नियम और सख्त किए हैं- 25,000 जुर्माना, रजिस्ट्रेशन रद्द और अभियान चलाए जा रहे हैं।
अभिभावकों के लिए सलाह
चाबियां छिपाएं, नाबालिग को वाहन न दें। जागरूक रहें, क्योंकि ‘मेरी जानकारी नहीं थी’ का बहाना अब काम नहीं आता। सड़क सुरक्षा ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा है। अभिभावक ही बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं।
















