भारतीय परिवारों में संपत्ति के बंटवारे को लेकर झगड़े अब आम बात हो चुके हैं. कानून बेटियों को बेटों के बराबर पैतृक संपत्ति में हिस्सा देता है, लेकिन शादी के बाद भी हर बेटी का दावा सफल नहीं होता. तीन खास हालात ऐसे हैं जहां अदालतें बेटी के हक को सिरे से खारिज कर देती हैं. ये जाल लाखों महिलाओं के सपनों पर पानी फेर सकते हैं.

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कानून का बुनियादी ढांचा
हिंदू परिवारों में बेटी जन्म से ही संपत्ति की मालिक होती है. यह अधिकार शादी के बाद भी कायम रहता है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बेटी परिवार की कोपार्सनर है, यानी हिस्से की हकदार. लेकिन यह नियम पैतृक संपत्ति पर लागू होता है, न कि पिता की अपनी कमाई वाली निजी संपत्ति पर. पिता को अपनी मेहनत की संपत्ति पर पूरा हक है, जिसे वह अपनी मर्जी से बांट या बेच सकते हैं. यहीं से विवाद की जड़ें पनपती हैं.
पहला जाल, पिता का निधन 1956 से पहले
अगर पिता की मौत हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू होने से पहले हो गई, तो बेटी का कोई दावा नहीं बनता. पुराने नियमों के मुताबिक केवल बेटों को पैतृक जमीन या घर का हिस्सा मिलता था. बेटियां गिनी ही नहीं जाती थीं. आज भी कई पुराने मामले कोर्ट में आते हैं, जहां पोतियां या शादीशुदा बेटियां हिस्सा मांगती हैं. लेकिन जज साफ कहते हैं कि नया कानून पीछे की मौतों पर फिट नहीं बैठता. पंजाब के ग्रामीण इलाकों में ऐसी जमीनें आज भी भाइयों के कब्जे में हैं, और बहनें खाली हाथ लौटती हैं.
दूसरा जाल, पिता की वसीयत या बिक्री
पिता अगर अपनी कमाई की संपत्ति पर वसीयत लिख देते हैं, तो बेटी कुछ नहीं कर सकती. कानून पिता को यह आजादी देता है कि वह बेटे, भतीजे या किसी और को दे दें. जीवित रहते अगर उन्होंने जमीन बेच दी या गिफ्ट कर दी, तो बेटी का हक उसी पल समाप्त हो जाता है. दिल्ली और पंजाब के कोर्ट के हालिया फैसलों में कई बेटियां इसी आधार पर हार गईं. एक मामले में फ्लैट पर दावा करने वाली बेटी को वकील ने सलाह दी कि वसीयत को चुनौती देना लगभग नामुमकिन है. अगर बंटवारा 2004 से पहले हो चुका, तो कोपार्सनरी का नियम ही लागू नहीं होता.
तीसरा जाल, खुद का हक छोड़ने का कागज
शादी के समय या परिवारिक सुलह में अगर बेटी ने स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर कर हिस्सा छोड़ दिया, तो बाद में पछतावा बेकार. रिलीज डीड या त्याग पत्र कानूनी रूप से मजबूत होता है. अमृतसर के एक परिवार में बहन ने भाई को सौंप दी संपत्ति, लेकिन सालों बाद कोर्ट गई तो जज ने कागज को वैध माना. स्वेच्छा से लिया फैसला उलट नहीं सकता. सोशल मीडिया पर वायरल रील्स इस गलती की कहानियां दिखाती हैं, लेकिन जागरूकता की कमी से लोग फंसते रहते हैं.
बेटियां क्या करें बचाव के लिए
समय रहते दस्तावेज इकट्ठा करें, जैसे जन्म प्रमाण पत्र, पिता का मृत्यु प्रमाण और संपत्ति के कागजात. विवाद हो तो 12 साल के अंदर कोर्ट का रास्ता अपनाएं. सरकारी कानूनी सहायता योजनाओं का फायदा उठाएं. वकीलों का कहना है कि जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है. अमृतसर जैसे शहरों में संपत्ति पोर्टल्स से जानकारी लें और परिवार से खुलकर बात करें.
यह मुद्दा नारी सशक्तिकरण को आईना दिखाता है. बेटियां हक मांग रही हैं, लेकिन कानून के इन छिपे कोनों को समझना जरूरी है. परिवार पहले एकजुट रहें, वरना कोर्ट के चक्कर ही जिंदगी बर्बाद कर देंगे.
















