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पत्नी कोई रसोइया नहीं, बराबरी की पार्टनर है’! पति की बेतुकी मांग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक मामले में पति को फटकार लगाई। पत्नी रसोइया या नौकरानी नहीं, बराबरी का साथी है। घर के कामों में पति को भी मदद करनी चाहिए। समय बदल चुका, वैवाहिक जीवन साझेदारी है।

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भारतीय अदालतों ने एक बार फिर वैवाहिक संबंधों में लिंग समानता को मजबूत संदेश दिया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान पति की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी द्वारा घरेलू कामों में हिस्सा न लेने को आधार बनाया था। कोर्ट ने साफ कहा कि विवाह अब पुरानी सोच के दायरे में नहीं बंधा। पत्नी कोई रसोइया या नौकरानी नहीं, बल्कि बराबरी का पार्टनर है। पति को भी रसोई, सफाई और अन्य कामों में सहयोग देना चाहिए।

पत्नी कोई रसोइया नहीं, बराबरी की पार्टनर है'! पति की बेतुकी मांग पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 2017 में हुई शादी से जुड़ा है। पति ने पत्नी पर घर के काम न करने, गाली गलौज और परिवार के खिलाफ बोलने के आरोप लगाए। दूसरी ओर पत्नी ने ससुराल पक्ष पर दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना का इल्जाम लगाया। दंपति का एक आठ साल का बच्चा भी है, जो पारिवारिक जटिलताओं को बढ़ाता है। निचली अदालतों ने तलाक याचिका नामंजूर कर दी। मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा तो वहां मध्यस्थता की कोशिश हुई, लेकिन असफल रही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दैनिक घरेलू असहमति को क्रूरता नहीं माना जा सकता।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने पति से कहा कि समय बदल चुका है। नौकरानी से शादी का दौर लद गया। जीवनसाथी को घर के हर काम में साझेदारी करनी चाहिए। खाना पकाना या कपड़े धोना केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं। कोर्ट ने जोर दिया कि वैवाहिक जीवन साझा जिम्मेदारियों पर टिका होता है। एक पक्ष का बोझ दूसरे पर डालना न्यायसंगत नहीं। यह टिप्पणी न केवल इस मामले तक सीमित है, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन का संकेत देती है।

कानूनी निहितार्थ

हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता तलाक का आधार हो सकती है, लेकिन सामान्य घरेलू विवाद इससे मेल नहीं खाते। संविधान के समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुसार विवाह अब साझेदारी है। पत्नी को रहने, भरण पोषण और सम्मान का अधिकार है। संपत्ति और फैसलों में भी उसकी बराबरी सुनिश्चित होनी चाहिए। यह फैसला भविष्य के मामलों में नजीर बनेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पितृसत्तात्मक मान्यताओं को झटका लगेगा।

सामाजिक प्रभाव

यह निर्णय महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। समाज में अक्सर पत्नी को घरेलू दासी माना जाता है, लेकिन अदालत ने इसे चुनौती दी। पुरुष संगठनों ने बहस छेड़ी है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि समानता ही प्रगति का आधार है। लाखों परिवारों को यह संदेश मिलेगा कि विवाह दासता नहीं, साझा यात्रा है। आधुनिक भारत में जेंडर भूमिकाएं बदल रही हैं।

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info@nitap.in

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