
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी उम्मीदवार को केवल उसके माता-पिता की 8 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय के आधार पर ‘क्रीमी लेयर’ (आरक्षण से बाहर) में नहीं डाला जा सकता, शीर्ष अदालत का यह रुख उन हजारों छात्रों और नौकरीपेशा युवाओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्हें अब तक केवल आय सीमा के चलते आरक्षण के लाभ से वंचित रखा जा रहा था।
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क्या है सुप्रीम कोर्ट का नया निर्देश?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए ‘आय’ (Income) एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती कोर्ट ने 1993 के मूल प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि आय के साथ-साथ ‘पद की स्थिति’ (Status of post) का आकलन करना अनिवार्य है।
सैलरी और खेती की कमाई पर बड़ी स्पष्टता
अदालत ने आरक्षण के नियमों में उलझन को खत्म करते हुए दो बड़े स्पष्टीकरण दिए हैं:
- वेतन (Salary) और कृषि आय (Agricultural Income): आय परीक्षण (Income Test) के दौरान माता-पिता की सैलरी और खेती से होने वाली कमाई को शामिल नहीं किया जाएगा। 8 लाख की सीमा केवल ‘अन्य स्रोतों’ (जैसे व्यापार या निवेश) से होने वाली आय पर लागू होगी।
- ग्रुप-सी और डी कर्मचारियों को राहत: यदि माता-पिता सरकारी सेवा के ग्रुप-सी या ग्रुप-डी (क्लास III और IV) में कार्यरत हैं, तो उनकी सैलरी को क्रीमी लेयर की गणना में नहीं जोड़ा जाएगा।
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प्राइवेट और PSU कर्मचारियों के साथ भेदभाव खत्म
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार (DoPT) के 2004 के उस स्पष्टीकरण को अवैध करार दिया है, जिसके कारण प्राइवेट सेक्टर और सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में काम करने वालों के बच्चों को सरकारी कर्मचारियों के मुकाबले नुकसान उठाना पड़ रहा था, अब प्राइवेट सेक्टर और PSU में समान पदों पर कार्यरत लोगों के बच्चों को भी वही लाभ मिलेगा जो सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को मिलता है।
6 महीने में समीक्षा के आदेश
कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश दिया है कि जिन उम्मीदवारों के दावों को गलत तरीके से खारिज किया गया था, उनकी 6 महीने के भीतर समीक्षा की जाए प्रभावित उम्मीदवारों को पदोन्नति और उचित कैडर आवंटन जैसे लाभ ‘बैकडेट’ से भी मिल सकते हैं।
















