
हिंदू परिवारों में उत्तराधिकार और संपत्ति के विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा मील का पत्थर फैसला सुनाया है, जिसने दशकों से चली आ रही कानूनी और सामाजिक उलझनों को सुलझा दिया है, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी हिंदू विधवा की कोई संतान नहीं है, तो उसकी संपत्ति और भरण-पोषण के अधिकारों को लेकर कानून की स्थिति क्या होगी।
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ससुर की संपत्ति में बहू का कानूनी अधिकार बहाल
हाल ही में कंचना राय बनाम गीता शर्मा (2026) मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने साफ किया कि एक विधवा बहू अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की वैध हकदार है।
अदालत ने कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम की धारा 19 के तहत, ससुर की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी विधवा बहू का ख्याल रखे, बशर्ते महिला के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत न हो और उसने पुनर्विवाह न किया हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “बहू घर की लक्ष्मी होती है और पति की मृत्यु के बाद उसे बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता।”
ससुराल या मायका: पलड़ा किधर भारी?
संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के प्रावधानों को फिर से रेखांकित किया है। फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- यदि महिला निसंतान है और उसने वसीयत नहीं छोड़ी है, तो उसकी स्व-अर्जित (Self-acquired) संपत्ति पर उसके पति के उत्तराधिकारियों (ससुराल पक्ष) का पहला हक होगा, न कि उसके मायके वालों का।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि महिला को कोई संपत्ति अपने पिता या माता से विरासत में मिली थी, तो उसकी मृत्यु के बाद वह संपत्ति वापस उसके पिता के वारिसों (मायके पक्ष) को चली जाएगी।
- यदि महिला को संपत्ति उसके पति या ससुर से मिली थी, तो वह स्वतः ही पति के उत्तराधिकारियों के पास वापस जाएगी।
‘हिंदू परंपरा और गोत्र’ का दिया हवाला
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संस्कृति और प्राचीन मान्यताओं का भी जिक्र किया, कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह के बाद महिला का गोत्र बदल जाता है और वह अपने पति के परिवार का अभिन्न अंग बन जाती है, यही कारण है कि कानून में पति के परिवार को प्राथमिकता दी गई है।
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विशेषज्ञों की राय: ‘वसीयत’ है सबसे बड़ा समाधान
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से उन महिलाओं को मजबूती मिली है जिन्हें ससुराल से बेदखल कर दिया जाता था हालांकि, कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि अगर कोई महिला चाहती है कि उसकी संपत्ति उसके मायके वालों या किसी खास व्यक्ति को मिले, तो उसे ‘वसीयत’ (Will) जरूर बनानी चाहिए। बिना वसीयत के, कानून का झुकाव ससुराल पक्ष की ओर ही रहेगा।
यह फैसला न केवल कानूनी स्पष्टता लाता है, बल्कि विधवा महिलाओं के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार की भी रक्षा करता है, अब यह साफ है कि एक हिंदू विधवा अपने ससुर की पुश्तैनी संपत्ति में अपने हिस्से का दावा मजबूती से कर सकती है।
















