
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य निर्माण आंदोलन के नायकों को सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए एक क्रांतिकारी निर्णय लिया है। फरवरी 2026 में कैबिनेट की बैठक में स्वीकृत इस फैसले के तहत आंदोलन के दौरान कम से कम सात दिन जेल में रहे या घायल हुए आंदोलनकारियों की मासिक पेंशन सात हजार रुपये कर दी गई है। यह कदम न केवल आंदोलनकारियों के बलिदान को अमर करता है, बल्कि उनके आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। राज्य के गौरवशाली इतिहास के इन वीर सपूतों को मिलने वाली यह सहायता जीवन भर चलेगी, जो उनकी वीरता की सच्ची पहचान बनेगी।
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राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि
उत्तराखंड राज्य आंदोलन, जो मुख्य रूप से 1994-95 में चला, ने हजारों लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। मुजफ्फरनगर कांड से प्रारंभ होकर तेजसवी आंदोलन तक यह संघर्ष चला, जिसमें सैकड़ों शहीद हुए, हजारों जेल यात्रा पर गए और असंख्य घायल हुए। धामी सरकार ने इन्हीं वीरों के सम्मान में पेंशन संरचना में व्यापक बदलाव किया है। जेल गए या घायल आंदोलनकारियों की पेंशन छह हजार से बढ़ाकर सात हजार रुपये प्रतिमाह हो गई है।
पेंशन वृद्धि का विवरण
समान रूप से, अन्य चिन्हित आंदोलनकारियों- जो जेल या चोट की श्रेणी में नहीं आते- की सहायता चार हजार पांच सौ से पांच हजार पांच सौ रुपये हो गई। शहीद आंदोलनकारियों के आश्रितों को तीन हजार से पांच हजार पांच सौ रुपये की बढ़ोतरी मिली है। सबसे विशेष यह है कि पूर्णतः शय्याग्रस्त या बिस्तर पर पड़े विकलांग आंदोलनकारियों की पेंशन बीस हजार से सीधे तीस हजार रुपये प्रतिमाह कर दी गई, साथ ही उनकी देखभाल के लिए मेडिकल अटेंडेंट की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई।
सरकार की प्रतिबद्धता और प्रभाव
यह फैसला उत्तराखंड की धामी सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। पिछले वर्षों में भी 2021 और 2025 में पेंशन वृद्धि हुई थी, लेकिन इस बार यह राशि अभूतपूर्व स्तर पर पहुंची है। वर्तमान में करीब सात हजार से अधिक आंदोलनकारी और उनके आश्रित इससे लाभान्वित होंगे। मुख्यमंत्री धामी ने कहा, “राज्य आंदोलन के नायक आज भी हमारे प्रेरणास्रोत हैं। उनका बलिदान ही उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का आधार बना। हम उनके सम्मान में कृतसंकल्प हैं।”
आंदोलनकारियों में उत्साह
इस निर्णय से आंदोलनकारी समुदाय में उत्साह का संचार हुआ है। देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल जैसे जिलों में आंदोलनकारियों ने धामी सरकार का अभिनंदन किया। पेंशन लाभ के लिए पात्रता सुनिश्चित करने हेतु जिला मजिस्ट्रेट कार्यालयों में 2021 तक जमा आवेदनों के निस्तारण के लिए छह माह का अतिरिक्त समय दिया गया है। अब तक हजारों पहचान पत्र जारी हो चुके हैं, लेकिन लंबित मामलों को प्राथमिकता मिलेगी।
अतिरिक्त सम्मान और पारदर्शिता
इसके अलावा, शहीद आंदोलनकारियों के गांवों में बुनियादी सुविधाओं- जैसे स्कूल, अस्पताल या सड़कों- का नामकरण उनके नाम पर किया जाएगा। यह कदम न केवल आर्थिक सहायता देगा, बल्कि सामाजिक सम्मान भी बहाल करेगा। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेंशन डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से सीधे खाते में आएगी, जिससे पारदर्शिता बनी रहेगी।
राजनीतिक प्रभाव
राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला भाजपा सरकार की लोकप्रियता को और मजबूत करेगा, खासकर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले। विपक्षी दल भी इसे सकारात्मक बता रहे हैं, हालांकि वे पुरानी मांगों जैसे पेंशन को पंद्रह हजार करने की बात दोहरा रहे हैं। फिर भी, धामी सरकार का यह कदम राज्य आंदोलन की चांदी जयंती के बाद एक और मील का पत्थर साबित हो रहा है। आंदोलनकारी संगठनों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर आभार जताया और कहा कि यह निर्णय उनके दशकों पुराने संघर्ष का फल है।
ऐतिहासिक महत्व
कुल मिलाकर, यह फैसला उत्तराखंड के इतिहास को जीवंत करने का प्रयास है। आंदोलनकारियों की आहुति व्यर्थ नहीं गई, बल्कि राज्य के विकास का आधार बनी। धामी सरकार की यह पहल निश्चित रूप से अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बनेगी, जहां अलग राज्य आंदोलन चले। अब सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि पर्याप्त है या और बढ़ोतरी की मांग उठेगी? समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल आंदोलन के नायकों के चेहरों पर मुस्कान आ गई है।
















