
नई दिल्ली। भारतीय रेलवे की सबसे आधुनिक और प्रीमियम ट्रेन ‘वंदे भारत एक्सप्रेस’ को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जिस ट्रेन को हम रेलवे की शान मानते हैं, तकनीकी और वित्तीय रूप से उसका असली मालिक भारतीय रेलवे (Indian Railways) नहीं है, इस ‘सीक्रेट’ डील के पीछे का सच यह है कि वंदे भारत समेत देश की कई बड़ी ट्रेनों का मालिकाना हक भारतीय रेलवे वित्त निगम (IRFC) के पास है।
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क्या है यह ‘सीक्रेट’ डील?
वंदे भारत ट्रेनों के निर्माण और फाइनेंसिंग की जिम्मेदारी IRFC उठाता है, IRFC एक सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU) है, जो बाजार से पैसा जुटाकर रेलवे के लिए कोच, इंजन और वैगन खरीदता है या बनवाता है, इसके बाद, इन ट्रेनों को भारतीय रेलवे को 30 साल की लंबी अवधि के लिए लीज पर दे दिया जाता है।
रेलवे क्यों चुकाता है करोड़ों का किराया?
चूंकि ट्रेनों का तकनीकी स्वामित्व IRFC के पास होता है, इसलिए भारतीय रेलवे इनके संचालन के लिए हर साल भारी-भरकम ‘लीज रेंटल’ यानी किराया चुकाता है।
- रेलवे के पास एक साथ इतनी बड़ी पूंजी नहीं होती कि वह सभी आधुनिक ट्रेनें खरीद सके। IRFC से लीज पर लेने से रेलवे को एक साथ बड़ी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती।
- वित्त वर्ष 2023-24 में, भारतीय रेलवे ने इन ऋणों के मूलधन (Principal) और ब्याज के रुप में ₹30,154 करोड़ का भुगतान किया है।
- वर्तमान में रेलवे ने IRFC से लगभग ₹2.95 लाख करोड़ की संपत्तियां लीज पर ले रखी हैं, जिनमें वंदे भारत, शताब्दी और राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेनें शामिल हैं।
80% ट्रेनों का यही है हाल
भारतीय रेलवे की लगभग 80% यात्री और मालगाड़ियों का मालिकाना हक तकनीकी रूप से IRFC के पास ही है, IRFC बाजार से बॉन्ड और डिबेंचर के जरिए फंड जुटाता है और रेलवे की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे विद्युतीकरण और नई पटरियां बिछाने में भी मदद करता है।
भले ही वंदे भारत का संचालन और ब्रांडिंग भारतीय रेलवे के हाथ में हो, लेकिन वित्तीय रूप से यह IRFC की संपत्ति है, जिसके लिए सरकार हर साल करोड़ों की किश्तें चुका रही है।
















