
कैलिफोर्निया के सैन फ्रांसिस्को में स्थित AI स्टार्टअप कर्सर इन दिनों अपनी ‘नो-शूज’ पॉलिसी के कारण सुर्खियों में है। एक डेवलपर आंद्रे लैंडग्राफ ने X (पूर्व ट्विटर) पर ऑफिस के फर्श पर बिखरे जूतों की तस्वीर शेयर की, जिसके साथ कैप्शन था, “Funny that everyone in SF immediately knows which office this is.” टेक कम्युनिटी ने तुरंत इसे कर्सर का ऑफिस पहचान लिया। यह घटना सिलिकॉन वैली के रिलैक्स्ड वर्क कल्चर को दर्शाती है, जहां जूते उतारकर काम करना आम हो रहा है।
कंपनी में कर्मचारी और विजिटर दरवाजे पर ही जूते छोड़ देते हैं। अंदर मोजों या स्लिपर्स में काम होता है। यह पॉलिसी न केवल साफ-सफाई बनाए रखती है, बल्कि ऑफिस को घर जैसा आरामदायक बनाती है। कर्सर के कर्मचारी बेन लैंग ने पहले भी ऐसी तस्वीरें शेयर की थीं, जिसमें उन्होंने बताया कि वे हमेशा ऐसे स्टार्टअप्स में काम करते रहे हैं जहां जूते वैकल्पिक होते हैं।
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कर्सर क्या है?
कर्सर एक AI-आधारित इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट एनवायरनमेंट (IDE) है, जो डेवलपर्स को कोड लिखने, एडिट करने और समझने में मदद करता है। नैचुरल लैंग्वेज प्रॉम्प्ट्स से यह कोड जेनरेट कर सकता है और बग्स सुधारने के सुझाव देता है। 2022 में MIT के चार पूर्व छात्रों- माइकल ट्रूएल (CEO), अमन संगर (भारतीय मूल के), सुआलेह आसिफ और अरविंद लुन्नेमार्क ने इसकी स्थापना की।
नवंबर 2025 में कंपनी ने 2.3 बिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई, जिससे इसकी वैल्यूएशन 29.3 बिलियन डॉलर पहुंच गई। यह तेजी से बढ़ते AI टूल्स में अग्रणी है। अमन संगर जैसे भारतीय मूल के फाउंडर की मौजूदगी इसे खास बनाती है। भारतीय यूजर्स सोशल मीडिया पर कमेंट कर रहे हैं कि यह नीति भारत की घरेलू संस्कृति से मिलती-जुलती है, जहां अंदर जूते उतारना आम है।
नो-शूज पॉलिसी की असली वजहें
कर्सर का कहना है कि यह नियम तनाव कम करता है और फोकस बढ़ाता है। सिलिकॉन वैली की हाई-प्रेशर जॉब्स में 10-12 घंटे काम करने वाले कर्मचारियों के लिए स्लिपर्स ज्यादा आरामदायक हैं। बेन लैंग ने 25 अन्य स्टार्टअप्स की लिस्ट शेयर की, जहां यही पॉलिसी है। साफ-सफाई भी बड़ा कारण है- खासकर सैन फ्रांसिस्को की बारिश में गंदे जूते ऑफिस को मैला करते हैं।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री निक ब्लूम इसे ‘पजामा इकॉनमी’ का हिस्सा बताते हैं। महामारी के बाद कर्मचारी घर जैसा कम्फर्ट ऑफिस में चाहते हैं। AI सिमुलेशन स्टार्टअप कॉवेल की फाउंडर ब्रूक हॉपकिन्स ने कहा, “बारिश के दिनों में जूतों से जगह गंदी हो जाती थी, इसलिए नो-शूज अपनाया।” स्पर AI की CEO स्नेहा शिवकुमार भी इसे ‘सेकंड होम’ जैसा माहौल मानती हैं।
सिलिकॉन वैली में बढ़ता ट्रेंड
यह ट्रेंड नया नहीं है। 2019 से स्टार्टअप्स में चर्चा में था। कई टेक लीडर्स एशियाई या जापानी परिवारों से आते हैं, जहां जूते उतारना परंपरा है। कर्सर के अलावा अन्य AI स्टार्टअप्स जैसे कॉवेल इसमें शामिल हैं। हालांकि, यह मुख्य रूप से युवा स्टार्टअप्स और सिलिकॉन वैली तक सीमित है। कॉर्पोरेट दफ्तरों में अभी पारंपरिक ड्रेस कोड हावी है।
सोशल मीडिया पर रिएक्शन मिले-जुले हैं। कुछ इसे कूल मानते हैं, तो कुछ अस्वच्छ बताते। एक भारतीय यूजर ने लिखा, “भारत में तो घर में ही ऐसा होता है, ऑफिस में?” यह ट्रेंड रिमोट वर्क से हाइब्रिड कल्चर की ओर इशारा करता है।
भारत के लिए सबक या मजाक?
भारत में सरकारी दफ्तरों या बैंकिंग सेक्टर में ऐसी पॉलिसी कल्पना से परे है। लेकिन प्राइवेट स्टार्टअप्स जैसे बेंगलुरु या दिल्ली के टेक हब्स में यह ट्रेंड आ सकता है। कर्सर की सफलता दिखाती है कि अनोखे नियम कर्मचारी संतुष्टि बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आरामदायक माहौल उत्पादकता 20% तक बढ़ा सकता है।
कुल मिलाकर, कर्सर की नो-शूज पॉलिसी सिलिकॉन वैली के इनोवेटिव कल्चर का प्रतीक है। यह आराम, संस्कृति और प्रैक्टिकलिटी का मिश्रण है। जैसा आंद्रे लैंडग्राफ ने कहा, सैन फ्रांसिस्को में हर कोई इसे पहचान लेता है। भविष्य में और स्टार्टअप्स इसे अपनाएंगे।
















