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क्या विवाहित बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है? जानें कानून की वो बारीक बात जो आपको कोई नहीं बताएगा

क्या शादी होते ही बेटी को पापा की प्रॉपर्टी से हाथ धोना पड़ता है? गलत! कानून कहता है बेटा-बेटी बराबर के मालिक। लेकिन 3 खास बातें ऐसी हैं, जो कोई नहीं बताता। ये पढ़ो, वरना अपना हक गंवा दोगे!

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भारतीय समाज में एक आम भ्रांति है कि विवाह के बाद बेटी का मायके की संपत्ति से कोई लेना-देना नहीं रह जाता। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि शादीशुदा बेटी को पिता की पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार प्राप्त हैं। यह बदलाव महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। कई परिवार अभी भी पुरानी सोच के जाल में फंसे हैं, जिससे बेटियां अपने हक से वंचित रह जाती हैं।

क्या विवाहित बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है? जानें कानून की वो बारीक बात जो आपको कोई नहीं बताएगा

कानूनी आधार और ऐतिहासिक बदलाव

हिंदू परिवारों के लिए लागू उत्तराधिकार कानून में 2005 का संशोधन मील का पत्थर साबित हुआ। इस बदलाव से पहले पैतृक संपत्ति का हिस्सा केवल बेटों को जन्म से मिलता था। अब बेटी भी परिवार की संयुक्त संपत्ति में जन्मजात हिस्सेदार है। चाहे वह शादीशुदा हो या अविवाहित, उसका अधिकार जीवन भर बना रहता है। पिता की मृत्यु पर या संपत्ति विभाजन के समय बेटी को समान भाग मिलना तय है। यह नियम हिंदू अविभाजित परिवार की संपत्ति पर पूरी तरह लागू होता है।

सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने इस अधिकार को और मजबूत किया। उदाहरण के तौर पर, एक प्रमुख मामले में अदालत ने कहा कि बेटी का हक जन्म से शुरू हो जाता है, न कि कानून लागू होने की तारीख से। इससे लाखों महिलाओं को न्याय मिला। लेकिन यह अधिकार केवल पैतृक संपत्ति तक सीमित है, जो पूर्वजों से चली आ रही हो। पिता द्वारा खुद कमाकर खरीदी गई संपत्ति पर उनका पूरा अधिकार रहता है। वे इसे वसीयत के जरिए किसी को भी सौंप सकते हैं। यदि वसीयत न हो, तो बेटी फिर भी क्लास वन उत्तराधिकारी के रूप में हिस्सा पा सकती है।

संपत्ति के प्रकार समझें

संपत्ति मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बंटती है। पहली, पैतृक या पुश्तैनी संपत्ति, जिसमें बेटी का स्वाभाविक हक है। यह वह धन-धान्य है जो चार पीढ़ियों से परिवार में चला आ रहा हो। दूसरी, स्व-अर्जित संपत्ति है, जो पिता की व्यक्तिगत मेहनत का फल। यहां बेटी का दावा तभी मजबूत होता है, जब पिता बिना वसीयत के चल बसे हों। ग्रामीण क्षेत्रों में खेत-खलिहान अक्सर पैतृक होते हैं, इसलिए बेटियां अब इन्हें बेचकर या खेती करके आत्मनिर्भर बन रही हैं। शहरी इलाकों में फ्लैट या प्लॉट पर भी यही नियम लागू।

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किन स्थितियों में हो सकता है अपवाद?

हर मामले में बेटी को हक मिलना आसान नहीं। यदि पिता का निधन संशोधन से पहले हो चुका था, तो पुराने नियम लागू हो सकते हैं। खासकर अगर उस समय संपत्ति का विभाजन पहले ही पूरा हो गया हो। बेटी ने स्वयं हिस्सा त्याग दिया हो या कानूनी रूप से अयोग्य घोषित हो, तब भी दावा कमजोर पड़ता है। परिवार के मुखिया को सलाह दी जाती है कि वे संपत्ति के कागजात साफ रखें और सभी को जागरूक करें। विवाद होने पर अदालत ही अंतिम फैसला सुनाती है।

समाज पर प्रभाव और आगे की राह

यह कानून न केवल आर्थिक न्याय देता है, बल्कि लैंगिक समानता को भी बढ़ावा देता है। पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में बेटियां अब पारिवारिक निर्णयों में आगे आ रही हैं। फिर भी ग्रामीण इलाकों में रूढ़ियां बाधा बनती हैं। बेटियां डर या सामाजिक दबाव से हक नहीं मांगतीं। जागरूकता के लिए लीगल एड कैंप और सामुदायिक कार्यक्रम जरूरी हैं। युवा वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आगे आना चाहिए। अंतत: यह अधिकार संवैधानिक है, न कि कोई सरकारी योजना। परिवारों को इसे समझकर बेटियों को उनका हक दिलाना चाहिए।

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info@nitap.in

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