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Chaiti Chhath 2026: 22 मार्च से शुरू होगा चैती छठ का महापर्व! नोट करें नहाय-खाय से अर्घ्य तक की सही तिथियां और शुभ मुहूर्त

चैती छठ 22 मार्च से शुरू होगा। नहाय-खाय (22), खरना (23), संध्या अर्घ्य (24) व उषा अर्घ्य (25) तक चलेगा। सूर्य देव व छठी मां की पूजा से सुख-स्वास्थ्य मिलेगा। घाटों पर भक्ति का माहौल बनेगा।

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चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में सूर्य देव और छठी मां की आराधना का पावन समय नजदीक आ गया है। इस वर्ष चैती छठ महापर्व 22 मार्च से 25 मार्च तक चार दिनों तक श्रद्धा और संयम के साथ मनाया जाएगा। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में लाखों भक्त इस कठोर व्रत की तैयारियां तेजी से कर रहे हैं। यह पर्व परिवार में सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति और स्वास्थ्य लाभ की कामना को पूरा करने का प्रतीक है।

Chaiti Chhath 2026: 22 मार्च से शुरू होगा चैती छठ का महापर्व! नोट करें नहाय-खाय से अर्घ्य तक की सही तिथियां और शुभ मुहूर्त

नहाय-खाय, व्रत की शुद्ध शुरुआत

पर्व का प्रारंभ 22 मार्च को रविवार के दिन नहाय-खाय से होगा। इस दिन व्रती सुबह जलाशय या घर पर पवित्र स्नान कर घर को शुद्ध करते हैं। केवल सात्विक भोजन जैसे कद्दू भात और चने की दाल ग्रहण कर वे व्रत का संकल्प लेते हैं। बिना लहसुन-प्याज का यह निरामिष भोजन शुद्धता का पहला चरण पूरा करता है। मानसिक संयम रखते हुए नकारात्मक विचारों से दूरी बनाई जाती है।

खरना पूजन, निर्जला उपवास का आरंभ

23 मार्च को सोमवार के दिन खरना का आयोजन होगा। पूरे दिन निर्जला रहने के बाद शाम को गुड़ या गन्ने के रस से बनी खीर और रोटी सूर्य देव व छठी मैया को अर्पित की जाती है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास प्रारंभ हो जाता है। घाटों पर सामूहिक भजन-कीर्तन से भक्तिमय माहौल बनता है।

संध्या अर्घ्य, डूबते सूर्य को प्रणाम

24 मार्च को मंगलवार के दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है। व्रती डूबते सूर्य को बांस की सुपली में ठेकुआ, फल, नारियल और अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। सूर्यास्त से ठीक पहले यह कर्मकांड विशेष महत्व रखता है। भक्त जल में खड़े होकर पारंपरिक गीत गाते हैं।

उषा अर्घ्य और पारण, व्रत का समापन

महापर्व का समापन 25 मार्च को बुधवार के दिन भोर में उषा अर्घ्य से होता है। सूर्योदय से पहले उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। पहले जल ग्रहण कर फिर प्रसाद खाते हैं। स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त समय के अनुसार मुहूर्त निर्धारित करें।

धार्मिक महत्व और लोक मान्यताएं

यह व्रत सूर्य देव की पहली व आखिरी किरणों से विटामिन डी प्राप्ति और रोग निवारण का साधन माना जाता है। प्राचीन कथाओं में राजा-प्रजा द्वारा पुत्र प्राप्ति और संकट मोचन के चमत्कार जुड़े हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए प्लास्टिक मुक्त घाट और नदी स्वच्छता पर बल दिया जाता है। साफ बर्तनों से प्रसाद बनाएं और नशीले पदार्थों से दूर रहें।

यह महापर्व परिवारजनों में एकता का संदेश देता है। तैयारियां जोरों पर हैं, तिथियां नोट कर शुभकामनाओं सहित लाभ उठाएं। 

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info@nitap.in

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