
अधिकतर भारतीय अपनी गाढ़ी कमाई को सबसे सुरक्षित जगह यानी ‘सेविंग्स अकाउंट’ (Savings Account) में रखना पसंद करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आप बचत समझ रहे हैं, वह असल में आपके लिए ‘बड़े घाटे का सौदा’ साबित हो सकता है? बैंकिंग एक्सपर्ट्स की मानें तो बैंक की कुछ ऐसी अंदरूनी बातें हैं, जिन्हें आम ग्राहकों से अक्सर छिपाया जाता है।
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महंगाई की दीमक: पैसा बढ़ नहीं, बल्कि घट रहा है
आम आदमी को लगता है कि बैंक 3% या 3.5% का ब्याज दे रहा है, तो उसका पैसा सुरक्षित है और बढ़ रहा है, लेकिन असलियत इसके उलट है। देश में महंगाई की दर (Inflation Rate) अमूमन 5% से 6% के बीच रहती है।
- न्यूज फ्लेश: अगर महंगाई 6% है और बैंक आपको मात्र 3% ब्याज दे रहा है, तो तकनीकी रूप से आपका पैसा साल भर में 3% की वैल्यू खो चुका है। यानी जो सामान आप आज ₹100 में खरीद रहे हैं, अगले साल उसे खरीदने के लिए आपको ₹106 चाहिए होंगे, जबकि आपके अकाउंट में ब्याज मिलाकर सिर्फ ₹103 ही होंगे।
‘मिनिमम बैलेंस’ का चक्रव्यूह और भारी पेनल्टी
बैंकों का एक बड़ा मुनाफा ग्राहकों द्वारा ‘मिनिमम एवरेज बैलेंस’ (MAB) मेंटेन न कर पाने से आता है, विज्ञापन में आपको सुविधाओं का लालच दिया जाता है, लेकिन अगर बैलेंस तय सीमा से एक रुपया भी नीचे गया, तो बैंक भारी सर्विस चार्ज और पेनल्टी वसूलते हैं, कई मामलों में यह पेनल्टी साल भर में मिले कुल ब्याज से भी ज्यादा हो जाती है, जिससे ग्राहकों को अपनी मूल पूंजी से हाथ धोना पड़ता है।
टैक्स का ‘हिडन’ बोझ
ज्यादातर लोग इस मुगालते में रहते हैं कि सेविंग्स अकाउंट का ब्याज पूरी तरह टैक्स-फ्री है। इनकम टैक्स के नियम (Section 80TTA) कहते हैं कि केवल ₹10,000 तक का वार्षिक ब्याज ही टैक्स छूट के दायरे में आता है, यदि आपके खाते में बड़ी राशि जमा है और ब्याज इस सीमा को पार करता है, तो आपको अपनी इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स चुकाना होगा इससे आपका प्रभावी रिटर्न और भी कम हो जाता है।
एक्सपर्ट की राय: क्या करें?
वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि सेविंग्स अकाउंट को केवल इमरजेंसी फंड (1-2 महीने का खर्च) रखने के लिए इस्तेमाल करें, अधिक मुनाफे के लिए आप ‘स्वीप-इन’ (Sweep-in) एफडी सुविधा ले सकते हैं, जहाँ आपको सेविंग्स की लिक्विडिटी और एफडी का उच्च ब्याज, दोनों मिलते हैं।
















