हिंदू परिवारों के लिए एक नया दौर शुरू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति की बिक्री पर सख्त कायदे कायम कर दिए हैं। अब कोई भी व्यक्ति अकेले दम पर विरासती जमीन या मकान नहीं बेच सकेगा। सभी भाई-बहनों, बेटे-बेटियों समेत सह-वारिसों की सहमति के बिना कोई सौदा पक्का नहीं होगा। यह बदलाव संपत्ति के विवादों को जड़ से खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम है।

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सहमति का नया नियम
पैतृक संपत्ति वह होती है जो चार पीढ़ियों से परिवार में चली आ रही हो। कोर्ट का कहना है कि ऐसी अविभाजित संपत्ति बेचने से पहले हर सहदायिक को हामी भरनी पड़ेगी। अगर बंटवारा हो चुका है तो हिस्सा अपनी मर्जी से बेचा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर चार भाई-बहनों वाली जमीन पर अगर एक ने बाकियों को नजरअंदाज कर डील पक्की कर दी तो बाकी तीन सालों के अंदर कोर्ट जा सकते हैं। सौदा रद्द हो जाएगा। पंजाब हरियाणा जैसे इलाकों में जहां जमीन के लेन-देन आम हैं वहां यह नियम घर-घर पहुंचेगा।
बेटियों को मिला बराबर हक
बेटियां अब पैतृक संपत्ति में बेटों के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। जन्म से ही वे सहदायिक मानी जाएंगी। शादी हो या न हो हक कम नहीं होगा। पुराने कानूनों को नया रंग देकर कोर्ट ने साफ कहा कि महिलाओं का अधिकार किसी सूरत में कम नहीं किया जा सकता। इससे लाखों बेटियां मजबूत होंगी जो पहले संपत्ति के बंटवारे में पीछे धकेल दी जाती थीं।
शादी जैसे खास मामलों में छूट
HUF के मुखिया को कुछ खास हालात में ढील मिली है। बेटी की शादी या पारिवारिक कर्ज चुकाने जैसी जरूरी चीजों के लिए वह संपत्ति बेच सकता है। भले शादी पहले ही हो चुकी हो। लेकिन यह छूट दुरुपयोग न हो इसके लिए कोर्ट सबूत मांगेगा। गरीब घरों को इससे फायदा होगा पर बाकी मामलों में सहमति का पाबंदी बरकरार रहेगी।
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खरीदार कैसे बचें जोखिम से
जमीन खरीदने वालों के लिए खतरा बड़ा है। बिना सहमति बिकी संपत्ति पर कभी भी दावा हो सकता है। इसलिए रजिस्ट्री से पहले बंटवारे के कागजात सभी वारिसों के हस्ताक्षर रेवेन्यू रिकॉर्ड चेक करें। वकील से सलाह लेना जरूरी हो गया है। अमृतसर जैसे शहरों में जहां कृषि भूमि सस्ते में बिकती है वहां खरीदारों को अब दोगुनी सावधानी बरतनी पड़ेगी। दावे की समय सीमा 12 साल है लेकिन जल्दी पता चल जाए तो तुरंत कार्रवाई संभव है।
समाज पर गहरा असर
यह फैसला संयुक्त परिवार की नींव को मजबूत करेगा। उत्तर भारत के गांवों शहरों में संपत्ति के झगड़े कम होंगे। महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। पुराने सौदों पर सवाल उठ सकते हैं जिससे कोर्ट में मुकदमे बढ़ें। परिवारों को सलाह है कि लिखित समझौते रखें वसीयत तैयार करवाएं। जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है ताकि ग्रामीण इलाकों तक यह बात पहुंचे।
कुल मिलाकर पैतृक संपत्ति अब बाजार की भेंट नहीं चढ़ेगी। यह पीढ़ियों की साझा धरोहर बनेगी। कानून ने परिवार को प्राथमिकता दी है। संपत्ति मालिक और खरीदार दोनों सतर्क रहें तो विवादों से बचा जा सकता है।
















